तेनालीराम की कहानियाँ | Tenali Rama Short Story
बहुत समय पहले विजयनगर के राजमहल में होली का उत्सव पूरे राज्य की सबसे बड़ी धूमधाम से मनाया जाता था। हर गली, हर आँगन में रंग उड़ते थे, ढोलक की थाप पर नाच-गाना होता था और दरबार में हंसी-ठिठोली का माहौल रहता था। लेकिन इन सबके बीच एक परंपरा थी — हर साल दरबार में एक विशेष उपाधि दी जाती थी: “महामूर्ख” की उपाधि!
यह सुनने में अजीब लगती थी, पर असल में यह उपाधि हास्य और बुद्धिमानी की मिसाल मानी जाती थी। क्योंकि इसे हमेशा वह दरबारी जीतता था जो अपनी चतुराई से सबको हंसा दे, उलझा दे और अंत में अपनी बुद्धि से सबको मात दे दे। और हर साल यह खिताब जीतने वाला कोई और नहीं बल्कि खुद तेनाली रामा ही होते थे।
तेनाली रामा अपनी तीव्र बुद्धि और मज़ेदार स्वभाव से सबको मात दे देते थे। मगर दरबार के अन्य दरबारी यह बात बर्दाश्त नहीं कर पाते थे। वे सोचते थे — “हर साल वही महामूर्ख बने, और हमें मूर्ख बना जाए, ऐसा कब तक चलेगा!”
तो इस बार उन्होंने एक चाल चली। उनमें से एक चालाक दरबारी बोला, “अगर इस बार तेनाली रामा दरबार ही न पहुँच पाए, तो खिताब किसी और को मिलेगा!” सबने उसकी बात पर सिर हिलाया।
उन्होंने तेनाली रामा के नौकर को बुलाया और कहा, “अगर तू आज अपने मालिक को थोड़ा ज़्यादा भंग पिला दे, तो बाकी हम संभाल लेंगे।”
नौकर पहले तो डर गया, “महाराज! अगर उन्हें पता चल गया तो मेरी खैर नहीं!”
एक दरबारी मुस्कराकर बोला, “तेरे मालिक को तो होश ही नहीं रहेगा, और जब तक होश आएगा, तब तक हम अपना काम कर लेंगे।”
Tenali Rama Short Story
नौकर बहक गया। उस सुबह तेनाली रामा ने जब कहा, “ओ भोलू, जरा एक गिलास भंग ला दे,” तो नौकर ने मन में कहा, “अब मालिक सो जाएँगे तो सबका भला होगा।”
उसने भंग में खूब ज़्यादा मात्रा मिला दी। नतीजा — तेनाली रामा थोड़ी ही देर में गहरी नींद में डूब गए।
इधर दरबार में उत्सव शुरू हुआ। राजा कृष्णदेव राय ने मंच से घोषणा की, “आज हम देखेंगे कि इस साल का महामूर्ख कौन बनेगा!”
सभी दरबारी मंच पर अपनी-अपनी हरकतें दिखाने लगे — कोई मज़ाक कर रहा था, कोई गाना गा रहा था, कोई हँसी-मजाक में राजा की तारीफ़ें कर रहा था। लेकिन सबके मन में बस एक ही सुकून था — तेनाली रामा नहीं आए हैं!
दोपहर बीत गई। सूरज ढलने को आया। तभी अचानक दरबार के दरवाज़े खुले, और भीतर से एक अस्त-व्यस्त, रंगों से लथपथ, आँखें सुर्ख और बाल बिखरे हुए तेनाली रामा भागते हुए आए।
राजा ने उन्हें देखकर हँसते हुए कहा, “अरे तेनाली! तुम तो आज सच में महामूर्ख लग रहे हो! बाकी सब तो होली मना चुके और तुम अब उठे हो?”
तेनाली ने सिर झुकाकर कहा, “महाराज, गलती हो गई। आज भंग कुछ ज़्यादा चढ़ गई थी।”
राजा हँस पड़े, “तो तुम तो सच में मूर्ख निकले! आज तो तुम्हें महामूर्ख की उपाधि दे ही देनी चाहिए!”
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इतना सुनते ही दरबारी जो अब तक मुस्कान दबा रहे थे, ज़ोर-ज़ोर से हँस पड़े और बोले, “सही कहा महाराज! तेनाली रामा न सिर्फ मूर्ख हैं, बल्कि सच्चे महामूर्ख हैं!”
तेनाली रामा ने एक पल के लिए आँखें बंद कीं, फिर मुस्कराते हुए बोले, “महाराज, आपकी कृपा से मैं हर साल यह उपाधि जीतता आया हूँ, और आज आपने स्वयं मुझे महामूर्ख घोषित किया है। तो इस वर्ष का सबसे बड़ा पुरस्कार भी मेरा हुआ!”
दरबार में कुछ क्षण के लिए सन्नाटा छा गया। फिर राजा ज़ोर से ठहाका मारकर हँस पड़े। बाकी दरबारी भी शर्म से इधर-उधर देखने लगे। क्योंकि उन्होंने खुद ही तेनाली रामा को महामूर्ख घोषित कर दिया था — और वही पुरस्कार था!
राजा ने प्रसन्न होकर कहा, “तेनाली, तुम सच में महामूर्ख नहीं, महामानव हो! जो अपने ऊपर भी हँस सके, वही सच्चा ज्ञानी है।”
तेनाली रामा ने झुककर प्रणाम किया और बोले, “महाराज, अगर कोई खुद पर हँसना जानता है, तो कोई उसे मूर्ख नहीं बना सकता।”
इस तरह तेनाली रामा ने अपनी हाज़िरजवाबी से फिर सभी को मात दी और लगातार एक और साल ‘महामूर्ख’ का खिताब जीत लिया।
शिक्षा:
जो व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुरा सकता है और अपने ऊपर हँसना जानता है, वही सच्चा बुद्धिमान होता है। दूसरों की चालाकी उसके सामने हमेशा फीकी पड़ जाती है।




