तेनालीराम की कहानी | Tenali Rama Stories
विजयनगर का भव्य दरबार था। महाराजा कृष्ण देव राय अपने सिंहासन पर बैठे थे, लेकिन आज उनके चेहरे पर सामान्य तेज़ की जगह गहरी चिंता की लकीरें थीं। वे बार-बार अपनी खाली उंगली को देखते, आहें भरते और कुछ बुदबुदाते।
तेनालीराम, जो हमेशा राजा के स्वभाव को भलीभांति समझते थे, यह देखकर आगे बढ़े और मुस्कराते हुए बोले,
“महाराज, आज तो आपका मुखड़ा ऐसे उदास लग रहा है जैसे बादलों में चाँद छिप गया हो! क्या कोई परेशानी है?”
राजा ने भारी साँस लेते हुए कहा,
“तेनालीराम, मेरी प्रिय अंगूठी… वह खो गई है! वही जिसमें नीलम और पन्ने जड़े थे। वह केवल गहना नहीं, मेरे लिए सौभाग्य का प्रतीक थी।”
तेनालीराम ने पूछा, “महाराज, क्या आपने इसे कहीं उतारा था?”
राजा बोले, “नहीं! और यह भी पक्का है कि इसे बाहर से किसी ने नहीं चुराया होगा। यह चोरी मेरे ही अंगरक्षकों में से किसी ने की है।”
दरबार में सन्नाटा छा गया। हर कोई एक-दूसरे का चेहरा देखने लगा।
राजा ने गुस्से में कहा, “मेरे दरबार की दीवारें मजबूत हैं, पहरेदार चौकस हैं, फिर भी किसी ने मेरे विश्वास को तोड़ा है!”
तेनालीराम ने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज, कृपया शांति रखिए। मैं वचन देता हूँ कि चोर का पता आज ही लग जाएगा।”
तेनालीराम की कहानी
राजा ने तुरंत अपने बारहों अंगरक्षकों को बुलवा लिया। वे सब सामने आकर खड़े हो गए—किसी के चेहरे पर घबराहट, किसी पर आत्मविश्वास।
तेनालीराम ने सबको निहारा और बोले,
“देखिए, जो निर्दोष है उसे डरने की ज़रूरत नहीं। लेकिन जिसने गलती की है, वह अब बच नहीं सकता।”
राजा ने पूछा, “तेनालीराम, अब क्या योजना है?”
तेनालीराम बोले, “महाराज, हम सब काली माँ के मंदिर चलेंगे।”
राजा हैरान होकर बोले, “मंदिर? क्या हम दर्शन करने जा रहे हैं या चोर पकड़ने?”
तेनालीराम मुस्कराए, “दोनों, महाराज! काली माँ की कृपा से सच्चाई सामने आ ही जाएगी।”
मंदिर पहुँचने पर तेनालीराम ने पुजारी को एक कोने में बुलाया और कुछ फुसफुसाया। फिर वे लौटकर बोले,
“अब प्रत्येक अंगरक्षक बारी-बारी से माँ काली के चरणों में जाकर प्रणाम करेगा। जो सच्चा होगा, माँ उसका मार्ग प्रशस्त करेंगी।”
एक-एक कर सभी अंगरक्षक अंदर गए, माँ के चरणों को छुआ और बाहर आए। तेनालीराम हर एक का हाथ पकड़कर सूंघते जाते और मुस्कराते रहते।
राजा यह सब देख रहे थे, किंतु समझ नहीं पा रहे थे कि यह क्या हो रहा है।
कुछ देर बाद सभी बाहर आ गए। तेनालीराम ने सबको एक पंक्ति में खड़ा किया और शांति से बोले,
“महाराज, अब ध्यान से देखिए… चोर सातवें स्थान पर खड़ा है।”
तेनालीराम की कहानी
इतना सुनते ही सातवें अंगरक्षक का चेहरा पीला पड़ गया। उसकी आँखों में डर चमक उठा और वह अचानक भागने लगा। सैनिकों ने तुरंत उसे पकड़ लिया।
राजा ने आश्चर्य से पूछा, “तेनालीराम! यह कैसे संभव हुआ? आपने तो कहा था कि माँ काली स्वप्न में बताएँगी, और अभी तो रात भी नहीं हुई!”
तेनालीराम हँसते हुए बोले,
“महाराज, मैंने पुजारी से कहा था कि माँ के चरणों पर बहुत तेज़ खुशबू वाला इत्र छिड़क दें। जब सबने माँ के पैर छुए, तो उनके हाथों में उस इत्र की महक बस गई। मैंने सभी के हाथ सूंघे, और पाया कि सातवें अंगरक्षक के हाथ में कोई खुशबू नहीं थी। इसका मतलब साफ है—उसने डर के कारण माँ के चरणों को छुआ ही नहीं, क्योंकि उसका मन अपराधी था।”
राजा कुछ क्षण के लिए मौन रहे, फिर मुस्कुराते हुए बोले,
“तेनालीराम, तुम्हारी बुद्धि को प्रणाम! तुम्हारे जैसा चतुर व्यक्ति शायद ही इस धरती पर कोई हो।”
उन्होंने आदेश दिया कि चोर को कारागार में डाल दिया जाए और तेनालीराम को सौ स्वर्ण मुद्राएँ इनाम में दी जाएँ।
दरबारियों ने तालियाँ बजाईं, और तेनालीराम ने विनम्रता से सिर झुका दिया।
उस दिन से पूरे राज्य में चर्चा फैल गई—
“जिस दरबार में तेनालीराम हैं, वहाँ कोई अपराधी सच्चाई से बच नहीं सकता!”
शिक्षा:
बुद्धिमत्ता और चतुराई किसी भी कठिन परिस्थिति का समाधान कर सकती है। झूठ और अपराध चाहे कितना भी छिपा हो, सत्य की रोशनी में उजागर हो ही जाता है।




