💰 धर्मबुद्धि और पापबुद्धि | No Shortcuts in Life 🪙

पंचतंत्र की कहानियाँ | Panchatantra Stories | Panchatantra Story of Mind

हिम्मतनगर नामक नगर में दो मित्र रहते थे – धर्मबुद्धि और पापबुद्धि। नाम सुनने में भले ही अजीब लगें, पर दोनों बचपन से ही एक-दूसरे के गहरे साथी थे। धर्मबुद्धि सीधा-सादा, ईमानदार और भगवान में विश्वास रखने वाला था, जबकि पापबुद्धि चालाक, लालची और छल-कपट में निपुण था।

एक दिन दोपहर को, जब दोनों बरगद के पेड़ के नीचे बैठे थे, पापबुद्धि की आंखों में एक खतरनाक चमक उभरी।
वह मन ही मन बोला, “क्यों न मैं धर्मबुद्धि को किसी लालच में फंसाकर उसका सारा धन हथिया लूं?”
वह मुस्कराया और धीरे से बोला,
“मित्र धर्मबुद्धि! मैं सोच रहा हूँ कि हम दोनों इस छोटे से नगर में कब तक रहेंगे? क्यों न किसी दूसरे देश जाएँ, व्यापार करें, खूब धन कमाएँ और सुख से जीवन बिताएँ?”

धर्मबुद्धि बोला, “परंतु पापबुद्धि, हमें व्यापार का ज्ञान कहाँ?”
पापबुद्धि ने मीठे स्वर में कहा, “ज्ञान वहीं मिलेगा, जहाँ अवसर होगा। सोचो, अगर भगवान ने चाहा तो हम बहुत धनवान बन सकते हैं। क्या तुम मेरे साथ चलोगे?”

धर्मबुद्धि भोला था। उसने कहा, “जब तुम साथ हो, तो डर कैसा? चलो, मेहनत करेंगे और ईमानदारी से कमाएंगे।”

कुछ ही दिनों में दोनों ने यात्रा की तैयारी कर ली और शुभ मुहूर्त देखकर दूसरे नगर की ओर निकल पड़े। रास्ते भर धर्मबुद्धि तो भगवान का नाम जपता रहा, जबकि पापबुद्धि अपने दुष्ट इरादों को दिमाग में पक्का करता रहा।

वहां पहुंचकर दोनों ने व्यापार आरंभ किया। मेहनत, लगन और भाग्य के बल पर उन्होंने बहुत सारा माल बेचा और ढेर सारा धन कमा लिया। अब उनके पास सिक्कों की थैलियाँ थीं जो खनकते हुए मानो हँस रही थीं।

Panchatantra Story of Mind

जब वे अपने नगर लौटने लगे तो पापबुद्धि ने मन ही मन सोचा, “अब समय आ गया है इस भोले को मूर्ख बनाने का।”

रास्ते में उसने गंभीर चेहरा बनाकर कहा,
“मित्र, मैं सोच रहा था कि यह सारा धन एक साथ घर ले जाना ठीक नहीं। लोग देखेंगे तो ईर्ष्या करेंगे, कुछ कर्ज मांगेंगे और कोई चोर भी इसे चुरा सकता है।”
धर्मबुद्धि ने चिंता से कहा, “तो फिर क्या करें?”
पापबुद्धि बोला, “हम धन का कुछ हिस्सा जंगल में किसी सुरक्षित जगह गाड़ देते हैं। जब आवश्यकता होगी, तब निकाल लेंगे।”

धर्मबुद्धि ने बिना शक किए सहमति दे दी। दोनों जंगल में गए, एक गड्ढा खोदा और धन की थैलियाँ उसमें दबा दीं।
धर्मबुद्धि ने भगवान से प्रार्थना की, “हे प्रभु, हमारे धन की रक्षा करना।”
और फिर दोनों घर लौट आए।

कुछ दिनों बाद, पापबुद्धि ने मौका देखकर रात के अंधेरे में अकेले जंगल जाकर वह सारा धन निकाल लिया। उसकी आंखों में लालच की चमक थी। वह बोला, “अब यह सब मेरा है। धर्मबुद्धि क्या कर लेगा?”

कुछ समय बीता। एक दिन धर्मबुद्धि बोला,
“मित्र, अब घर की कुछ जरूरतें बढ़ गई हैं, चलो, जंगल से कुछ धन निकाल लाएँ।”
पापबुद्धि मुस्कुराते हुए बोला, “ज़रूर, क्यों नहीं?”

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दोनों जंगल पहुंचे। धर्मबुद्धि ने वही स्थान दिखाया। गड्ढा खोदा गया, लेकिन उसमें कुछ भी नहीं था!
धर्मबुद्धि हैरान रह गया। “हे भगवान! सारा धन कहाँ गया?”
तभी पापबुद्धि ने नाटक शुरू किया।
वह जोर-जोर से रोने लगा और बोला,
“धर्मबुद्धि! तुमने मुझ पर बहुत बड़ा अन्याय किया है। तुमने रात में सारा धन चुरा लिया!”

धर्मबुद्धि दंग रह गया। “क्या! मैं? मैं ऐसा नीच काम कभी नहीं कर सकता!”
पापबुद्धि गुस्से से बोला, “तब बताओ, धन कहाँ गया?”
दोनों में बहस बढ़ी और वे लड़ते हुए न्यायाधीश के पास पहुँच गए।

न्यायाधीश ने दोनों की बातें सुनीं। फिर गंभीर स्वर में कहा,
“इस विवाद का समाधान दिव्य परीक्षा से होगा। देवताओं से सत्य निकलवाया जाएगा।”
लेकिन पापबुद्धि बोला,
“न्यायाधीश महोदय, मेरे नगर के पास एक वन देवता हैं। वही साक्षी देंगे कि चोरी किसने की।”

न्यायाधीश ने सहमति दे दी।
पापबुद्धि घर जाकर अपने पिता से बोला,
“पिताजी, आप मेरी मदद करें। इस पेड़ के खोखले में छिप जाइए। जब न्यायाधीश पूछें कि किसने धन चुराया, तो आप ऊँचे स्वर में कहना—‘धर्मबुद्धि ने।’ तब सब मुझ पर विश्वास कर लेंगे।”

उसके पिता बेचारे डरते हुए बोले, “बेटा, यह ठीक नहीं है।”
पापबुद्धि बोला, “बस एक झूठ बोल दीजिए, धन हमारा हो जाएगा।”
लाचार पिता पेड़ के खोखले में छिप गए।

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अगले दिन न्यायाधीश, धर्मबुद्धि, पापबुद्धि और कई लोग उस पेड़ के पास पहुँचे।
न्यायाधीश ने ऊँचे स्वर में कहा,
“हे वन देवता! बताइए, उस धन को किसने चुराया?”

पेड़ के भीतर से आवाज़ आई,
“धन धर्मबुद्धि ने चुराया है!”

लोग हैरान रह गए। कुछ ने धर्मबुद्धि को दोषी ठहराना शुरू किया, लेकिन धर्मबुद्धि की आँखों में शक था।
उसने देखा, आवाज़ पेड़ के भीतर से आ रही है, मानो कोई इंसान बोल रहा हो।

वह चुपचाप पास गया और बोला,
“अगर यह देवता हैं, तो इन्हें आग से क्या डर?”
फिर उसने पास की मशाल से पेड़ की जड़ों में आग लगा दी।

थोड़ी ही देर में अंदर से कानों को चीर देने वाली चीख सुनाई दी।
“बचाओ! बचाओ!”
और पेड़ के भीतर से पापबुद्धि का पिता धुआँ उड़ाते हुए बाहर निकला, जलते कपड़ों में चिल्लाता हुआ गिर पड़ा।

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भीड़ स्तब्ध रह गई।
पापबुद्धि का चेहरा पीला पड़ गया। न्यायाधीश ने कहा,
“अब तो सच्चाई स्पष्ट है।”

पापबुद्धि का पिता रोते हुए बोला,
“क्षमा करें! मेरे पुत्र ने मुझे छल से यहाँ छिपाया था। असली चोर पापबुद्धि ही है!”

सभी लोग गुस्से से पापबुद्धि की ओर देखने लगे।
न्यायाधीश ने कठोर स्वर में आदेश दिया,
“ऐसे विश्वासघाती व्यक्ति को दंड मिलना ही चाहिए। इसे मृत्युदंड दिया जाए!”

और इस प्रकार, धर्म की जीत हुई।
धर्मबुद्धि को उसका सारा धन लौटा दिया गया, और नगर में फिर से न्याय की प्रतिष्ठा हुई।

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