🐺 सियार और खोखला ढोल | Jackal and Empty Drum 🥁

पंचतंत्र की कहानियाँ | Panchatantra Stories | Panchatantra Story of Jackal

बहुत समय पहले की बात है। एक विशाल जंगल के पास दो शक्तिशाली राज्यों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। दोनों ओर से सेनाओं की गर्जन, हाथियों की चिंघाड़, और घोड़ों की टापों से पूरा वातावरण गूंज उठा। युद्ध कई दिनों तक चला — अंततः जब धूल बैठी और सेनाएं लौट गईं, तो मैदान में टूटी तलवारें, फटे झंडे और बिखरे कवच रह गए।

उसी बर्बाद मैदान में एक चीज़ छूट गई — एक बड़ा ढोल।
यह वही ढोल था जिसे युद्ध से पहले भाट और चारण वीरता के गीत गाने के लिए बजाया करते थे। उसकी गूंज से सैनिकों में जोश भर जाता था।

युद्ध के बाद जब सब शांत हो गया, तो ढोल अकेला पड़ा रहा — धूल और पत्तों से ढका हुआ।
कई हफ्ते बीत गए। एक दिन अचानक एक तेज़ आंधी आई। हवा इतनी जोरदार थी कि पेड़ हिलने लगे, झाड़ियाँ उड़ने लगीं, और वह ढोल लुढ़कता-लुढ़कता जंगल के भीतर जा गिरा।
वह जाकर एक पुराने सूखे पेड़ के नीचे रुक गया। उस पेड़ की मुड़ी-तुड़ी टहनियाँ ढोल से सट गईं।

अब जब भी हवा चलती, टहनियाँ ढोल पर टकरातीं —
“ढमाढम! ढमाढम!”
पूरा जंगल उस गूंज से कांप उठता।

Panchatantra Story of Jackal

जंगल के प्राणी इस नई आवाज़ से घबरा गए।
किसी ने कहा, “शायद कोई नया दैत्य आ गया है!”
किसी ने कहा, “नहीं, यह तो किसी राक्षस की दहाड़ है।”

लेकिन सबसे ज़्यादा डर गया एक चालाक और डरपोक सियार, जो पास की एक गुफा में रहता था।

पहली बार जब उसने वह आवाज़ सुनी — “ढमाढम!” — तो वह अपनी पूंछ दबाकर भाग खड़ा हुआ।
“हे भगवान!” वह बड़बड़ाया, “यह कैसी खतरनाक आवाज़ है! ज़रूर कोई भयंकर जीव होगा, जो हवा में उड़ता होगा या ज़मीन हिला देता होगा!”

अगले कुछ दिन वह छिपकर ढोल की दिशा में नज़र रखता रहा। दिन ढलते ही वह झाड़ियों के पीछे से झांकता और डरते-डरते सोचता,
“कहीं यह जीव रात को शिकार करने न निकल आए।”

फिर एक दिन, कुछ अजीब हुआ।
सियार झाड़ियों में छिपा बैठा था। तभी एक नन्ही गिलहरी पेड़ से कूदकर सीधे ढोल पर आ गिरी।
“ढम!” की हल्की आवाज़ हुई, और गिलहरी आराम से वहीं बैठकर अपने दाने कुतरने लगी।

सियार ने हैरानी से देखा और कहा,
“अरे! अगर यह कोई दैत्य होता, तो इस गिलहरी को तो एक झटके में निगल जाता! यह तो शांत है… शायद यह कोई जीव नहीं।”

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उसका डर थोड़ा कम हुआ। अब जिज्ञासा बढ़ी।
धीरे-धीरे, दबे पांव वह ढोल के पास पहुँचा। उसने सूंघा — लेकिन वहाँ कोई गंध नहीं थी।
न उसमें पैर थे, न सिर। वह गोल और चमकीला था।

अचानक हवा चली और “ढम-ढम” की तेज़ आवाज़ हुई।
सियार डर के मारे उछलकर पीछे गिर गया!

“आह! तो अंदर कोई है!” वह चिल्लाया।
फिर उसके मन में एक लालच भरा विचार आया —
“इतनी भारी आवाज़ जो निकालता है, वह ज़रूर कोई मोटा-ताज़ा, चर्बीदार जीव होगा! अगर मैं उसे पकड़ लूँ तो महीनों का खाना मिल जाएगा!”

वह दौड़कर अपनी मांद में पहुँचा और सियारी (उसकी साथी) से बोला,
“सुनो! आज दावत के लिए तैयार हो जाओ। मैंने जंगल के सबसे मोटे शिकार का पता लगा लिया है!”

सियारी उत्सुक होकर बोली,
“तो उसे मारकर क्यों नहीं लाए?”

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सियार ने शान से कहा,
“वह एक मजबूत खोल में छिपा है। अगर मैं एक तरफ से पकड़ने जाऊं, तो वह दूसरी तरफ से भाग जाता है। लेकिन आज रात हम दोनों मिलकर उसे निकाल लेंगे!”

रात ढलते ही दोनों सियार उस ढोल के पास पहुंचे।
हवा चल रही थी — “ढम! ढम!” — आवाज़ फिर गूंजी।
सियार बोला, “सुनो इसकी आवाज़! इतना बड़ा और भारी जीव होगा। कल से सिर्फ आराम और दावत!”

उन्होंने ढोल को चारों ओर से खींचा, सूंघा और फिर अपने नुकीले दाँतों से चमड़ी काटनी शुरू की।
ढोल की मोटी खाल फटने लगी।
सियार बोला, “होशियार रहना! जैसे ही छेद हो, दोनों एक साथ हाथ डालेंगे और शिकार को पकड़ लेंगे!”

आखिर वह पल आ ही गया —
“एक… दो… तीन!”
दोनों ने “हूंऽऽ” की आवाज़ के साथ अपने पंजे अंदर डाल दिए।

पर… अंदर कुछ नहीं था!
सिर्फ खाली जगह और गूंजती हवा।

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दोनों ने एक-दूसरे के पंजे पकड़ लिए और एक साथ चीखे —
“अरे! यहां तो कुछ भी नहीं है!”

वे हक्का-बक्का रह गए।
“तो यह जो गूंज रही थी… वो सिर्फ हवा थी?” सियार ने दुखी होकर कहा।
सियारी ने गुस्से से सिर पीट लिया,
“अरे मूर्ख! तेरा ‘मोटा शिकार’ तो सिर्फ हवा निकला!”

दोनों शर्मिंदा होकर वहां से लौट गए — भूखे और मूर्ख महसूस करते हुए।

उस दिन के बाद से सियार ने कभी किसी आवाज़ पर भरोसा नहीं किया।
वह समझ गया था कि हर गूंज के पीछे कोई दैत्य नहीं होता — कभी-कभी वह सिर्फ हवा होती है।

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