पंचतंत्र की कहानियाँ | Panchatantra story of Monkey
शहर के पास एक विशाल मंदिर का निर्माण चल रहा था। सुबह से शाम तक वहां लकड़ियों की कटाई, पत्थरों की तराशी और हथौड़ों की ठक-ठक से पूरा वातावरण गूंजता रहता था। मजदूरों की मेहनत और पुजारियों के आशीर्वाद से मंदिर धीरे-धीरे आकार ले रहा था।
लकड़ी के काम का जिम्मा कुछ कुशल बढ़ईयों के पास था, जो बड़ी-बड़ी लकड़ियों को चीरकर खंभे और दरवाजों के चौखट बना रहे थे।
दोपहर का समय हुआ तो उन्होंने अपने औज़ार नीचे रखे और एक आधा-चिरा हुआ लठ्ठा, जिसमें बीच में एक कीला (लकड़ी का फाँस) ठोंका गया था, वैसे ही छोड़कर शहर की ओर भोजन करने चले गए।
काम का स्थान शांत हो गया। सूरज सिर पर था, हवा में ताजी लकड़ी की महक फैली हुई थी।
तभी पास के जंगल से बंदरों का एक झुंड वहां आ पहुंचा। उनकी छलांगें, शरारतें और चहचहाहट से पूरा वातावरण बदल गया।
दल का सरदार, एक बूढ़ा और समझदार बंदर, सबको रोकते हुए बोला,
“सावधान रहना सब! यह मनुष्यों का इलाका है। इधर-उधर की चीजों से छेड़छाड़ मत करना। ये लकड़ियाँ निर्दोष नहीं होतीं — इनके साथ खेलना खतरनाक है।”
सारे बंदरों ने सिर हिलाकर हामी भरी,
“हाँ, हाँ, हम नहीं छेड़ेंगे।”
और सब पेड़ों पर चढ़कर फल खाने और झूले झूलने में व्यस्त हो गए।
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लेकिन दल में एक था — नन्हा बंदर, जो सबसे ज्यादा शरारती था।
उसे किसी की बात मानने में मज़ा नहीं आता था।
वह सोचने लगा, “इतनी बड़ी लकड़ी यहाँ पड़ी है, और सब डर के मारे इसे छू भी नहीं रहे! मैं ज़रा देखता हूँ इसमें ऐसा क्या खास है।”
वह धीरे-धीरे उस आधे-चिरे लठ्ठे के पास पहुंचा।
वहां झाँककर देखा — बीच में एक कीला फंसा हुआ था।
उसकी आँखें उत्सुकता से चमक उठीं।
“हम्म… यह कीला क्या काम करता होगा?”
उसने उंगली से उसे हल्का-सा हिलाया।
कीला थोड़ा डगमगाया — और बस, शरारती बंदर का रोमांच बढ़ गया।
“अरे वाह! हिलता भी है!”
अब उसने दोनों हाथों से पकड़कर खींचा।
कीला थोड़ा और बाहर आया।
बंदर खिलखिलाकर बोला, “यह तो मज़ेदार है! मैं इसे पूरी तरह निकाल दूं तो शायद कोई रहस्य खुले!”
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उसे यह ध्यान ही नहीं रहा कि उसकी लंबी पूँछ धीरे-धीरे उसी लठ्ठे के दो हिस्सों के बीच फंस रही थी।
वह पूरे जोश से कीले को खींचता रहा।
अचानक —
ठप्!
जैसे ही कीला निकला, लठ्ठे के दोनों हिस्से एकदम से धड़ाम की आवाज़ के साथ बंद हो गए!
बंदर की पूँछ बुरी तरह फँस गई।
“आआआआआ!” — दर्द से उसका गला फट गया।
वह उछलने, कूदने, खींचने लगा, लेकिन लठ्ठा उसे छोड़ने को तैयार नहीं था।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
तभी मजदूर खाना खाकर लौटे।
एक ने दूर से देखा और चिल्लाया,
“अरे! ये क्या तमाशा है? एक बंदर हमारी लकड़ी में फँसा हुआ है!”
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सारे मजदूर दौड़ पड़े। बंदर घबरा गया।
“अब तो ये लोग मुझे पकड़कर पीटेंगे भी!” उसने सोचा।
उसने अपनी पूरी ताकत लगाई, जोर से झटका दिया —
और… छपाक!
उसकी पूँछ टूटकर अलग हो गई।
वह दर्द और शर्म से कराहता हुआ भाग गया — बिना पूँछ का बंदर, जो अब बाकी साथियों में मज़ाक का पात्र बन गया।
बंदरों का सरदार उसे देखकर सिर हिलाता बोला,
“मैंने पहले ही कहा था — मनुष्यों की चीज़ों से छेड़छाड़ मत करो। पर तूने सुना नहीं।”
शरारती बंदर ने सिर झुका लिया।
उस दिन उसने समझ लिया कि हर चमकदार या रहस्यमय चीज़ खेलने की नहीं होती — कुछ चीज़ें दूर से ही ठीक होती हैं।
शिक्षा:
बिना समझे किसी चीज़ से छेड़छाड़ नहीं करनी चाहिए। जिज्ञासा अच्छी है, लेकिन मूर्खतापूर्ण जिज्ञासा कभी-कभी बहुत बड़ा नुकसान कर सकती है।




