📖 भारत की 5 सबसे प्रसिद्ध देशभक्ति कविताएं: जो हर भारतीय की रगों में जोश भर देती हैं 🪶

भारत की 5 सबसे प्रसिद्ध देशभक्ति कविताएं | Hindi Poems

साहित्य समाज का दर्पण होता है, और जब बात देशभक्ति कविताओं (Patriotic Poems) की हो, तो ये शब्द मशाल बनकर जलते हैं। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौरान और उसके बाद भी, हमारे कवियों ने ऐसी कालजयी रचनाएँ कीं जिन्होंने सोए हुए राष्ट्र को जगाया। आज इस विशेष लेख में हम भारत की 5 सबसे प्रसिद्ध देशभक्ति कविताएं / कविताओं का संकलन प्रस्तुत कर रहे हैं, जो हर पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

1. सरफ़रोशी की तमन्ना (बिस्मिल अज़ीमाबादी / राम प्रसाद बिस्मिल)

यह कविता क्रांतिकारियों का नारा बन गई थी। जब राम प्रसाद बिस्मिल ने इसे अपनी आवाज़ दी, तो यह आज़ादी के दीवानों के लिए मंत्र बन गई। यह कविता अन्याय के खिलाफ खड़े होने और बलिदान देने का साहस सिखती है।

मुख्य पंक्ति: “वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऐ आसमाँ, हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है।”

2. पुष्प की अभिलाषा (माखनलाल चतुर्वेदी)

माखनलाल चतुर्वेदी जी ने एक साधारण फूल के माध्यम से देशभक्ति की सबसे विनम्र और गहरी परिभाषा दी है। यह कविता हमें सिखाती है कि राष्ट्र के रक्षकों का स्थान देवताओं से भी ऊँचा है।

मुख्य पंक्ति: “मातृभूमि पर शीश चढ़ाने, जिस पथ जावें वीर अनेक।”

3. कलम आज उनकी जय बोल (रामधारी सिंह ‘दिनकर’)

राष्ट्रकवि दिनकर की यह ओजस्वी रचना उन गुमनाम बलिदानियों को समर्पित है जिनका नाम इतिहास की मुख्यधारा में नहीं आ पाया। यह कविता कृतज्ञता और शौर्य का अद्भुत संगम है।

मुख्य पंक्ति: “कलम, आज उनकी जय बोल।”

4. झाँसी की रानी – सिंहासन हिल उठे (सुभद्रा कुमारी चौहान) – भारत की 5 सबसे प्रसिद्ध देशभक्ति कविताएं

यह वीर रस की सबसे लोकप्रिय कविता है। इसमें रानी लक्ष्मीबाई के अदम्य साहस और 1857 की क्रांति का ऐसा चित्रण है कि पाठक की आँखों के सामने इतिहास जीवंत हो उठता है।

मुख्य पंक्ति: “खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।”

5. सारे जहाँ से अच्छा (मोहम्मद इक़बाल) – भारत की 5 सबसे प्रसिद्ध देशभक्ति कविताएं

‘तराना-ए-हिंदी’ के नाम से मशहूर यह गीत भारत की अखंडता और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है। यह हमें गर्व दिलाता है कि हमारी सभ्यता दुनिया की सबसे प्राचीन और महान सभ्यताओं में से एक है।

मुख्य पंक्ति: “यूनान-ओ-मिस्र-ओ-रोमा सब मिट गए जहाँ से, अब तक मगर है बाक़ी नाम-ओ-निशाँ हमारा।”

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