तेनाली रामा की कहानियाँ | Tenali Rama Moral Story
विजयनगर के चमकदार दरबार में उस दिन एक अनोखी हलचल थी। एक विदेशी व्यापारी — फारस देश से आया हुआ एक धनी सौदागर — अपने साथ बेहद सुंदर और दुर्लभ नस्ल के घोड़े लेकर आया था। जैसे ही उसने नगर में प्रवेश किया, लोग उन घोड़ों को देखने के लिए उमड़ पड़े। उनके चमकते बाल, ऊँची कद-काठी और शाही चाल देखकर हर कोई दंग रह गया।
दरबार में यह खबर पहुंची कि एक व्यापारी ऐसे घोड़े लाया है, जो बादशाहों के योग्य हैं। राजा कृष्णदेव राय, जो स्वयं घोड़ों के बहुत बड़े पारखी थे, तुरंत बोले, “उसे हमारे दरबार में बुलाया जाए।”
थोड़ी देर में व्यापारी अपने शानदार वस्त्रों में झुककर प्रणाम करता हुआ आया। उसने राजा के सामने अपने घोड़े प्रस्तुत किए। घोड़े इतने शानदार थे कि दरबारियों की सांसें थम गईं।
राजा ने एक-एक घोड़े का ध्यान से निरीक्षण किया, उनके दांत, टाँगें, आँखें, चाल — सब कुछ परखा और प्रसन्न होकर बोले, “ये घोड़े सच में अद्भुत हैं। मैं इन्हें अवश्य खरीदूंगा।”
व्यापारी मुस्कुराया, “महाराज, ये फारस की शाही नस्ल के घोड़े हैं। इनके जैसा कोई नहीं।”
राजा ने पूरे झुंड को खरीद लिया और सैनिकों को आदेश दिया, “इन घोड़ों की देखभाल सर्वोत्तम तरीके से की जाए। अच्छा खाना, अच्छा प्रशिक्षण — सब कुछ राज्य के खर्च पर होगा।”
यह समाचार दरबार में फैल गया। तभी तेनाली रामा, जो हमेशा कुछ न कुछ चतुराई भरा उपाय निकालते रहते थे, मुस्कराते हुए बोले, “महाराज, मुझे भी एक घोड़ा चाहिए, ताकि मैं भी राज्य के गौरव में भागीदार बन सकूँ।”
राजा हँस पड़े, “ठीक है तेनाली, तुम्हें भी एक घोड़ा दिया जाए।”
Tenali Rama Moral Story
घोड़ा मिलने के बाद तेनाली ने उसे अपने घर के अस्तबल में बांध दिया। लेकिन उसने बाकी सैनिकों की तरह प्रशिक्षण नहीं दिया। उसने अस्तबल के चारों ओर मोटी दीवार बनवा दी — बस एक छोटी-सी खिड़की छोड़ी, जिससे वह घोड़े को रोज़ दाना-पानी देता था। घोड़ा अंदर फँसा रहता, बस खिड़की से अपना मुंह बाहर निकालता और खाना खा लेता।
सभी लोग सोचते, “तेनाली का दिमाग फिर गया है! यह घोड़े को यूँ बंद क्यों कर रहा है?” लेकिन तेनाली के चेहरे की मुस्कान सबको भ्रमित कर देती।
एक महीने बाद, राजा ने घोषणा की, “अब समय है सभी घोड़ों का निरीक्षण करने का। जो भी घोड़े सबसे अच्छे निकले, उनके प्रशिक्षकों को पुरस्कार दिया जाएगा।”
अगले दिन दरबार में सभी सैनिक अपने घोड़े लेकर आए — चमकदार, ताकतवर, शानदार! राजा की आँखों में प्रसन्नता झलक रही थी।
लेकिन तभी किसी ने कहा, “महाराज, तेनाली रामा नहीं आए!”
राजा ने भौंहें चढ़ाईं, “उसे बुलाओ!”
थोड़ी देर बाद तेनाली रामा अकेले दरबार में दाखिल हुए, चेहरे पर वही पुरानी शरारती मुस्कान।
राजा ने पूछा, “तेनाली! तुम्हारा घोड़ा कहाँ है?”
तेनाली बोला, “महाराज, मेरा घोड़ा बहुत गुस्सैल और जिद्दी है। वह अस्तबल से बाहर नहीं आता। मैं उसे लेकर नहीं आ सका।”
राजा बोले, “तो कोई बात नहीं। मैं कुछ सैनिक भेज देता हूँ, वे उसे पकड़कर यहाँ लाएँगे।”
तेनाली ने सिर हिलाया, “नहीं महाराज, सैनिक नहीं। वह घोड़ा केवल किसी पंडित की बात मानेगा। आप किसी ज्ञानी ब्राह्मण को भेजिए, वही उसे बाहर निकाल सकेगा।”
राजा ने मुस्कराकर कहा, “ठीक है, हमारे राजपुरोहित सुब्बा शास्त्री जाएंगे। आखिर वो ज्ञान में किसी से कम नहीं!”
सुब्बा शास्त्री, जो तेनाली रामा से हमेशा ईर्ष्या रखते थे, तुरंत बोले, “महाराज, मैं अभी उस घोड़े को लेकर आता हूँ। यह तो मेरे लिए खेल है!”
तेनाली ने विनम्र स्वर में कहा, “शास्त्री जी, सावधान रहिएगा। यह घोड़ा साधारण नहीं है।”
शास्त्री ने गर्व से कहा, “मैं शास्त्री हूँ, कोई साधारण व्यक्ति नहीं। चलो दिखाओ अपना घोड़ा।”
दोनों घोड़े के अस्तबल पहुँचे। तेनाली ने दीवार दिखाते हुए कहा, “घोड़ा अंदर है, बस इस खिड़की से देखिए। पहले जरा पहचान लीजिए।”
शास्त्री ने झुककर खिड़की से अंदर झांका और कहा, “हूँ! तो यह है तुम्हारा घोड़ा?”
इतना कहते ही उन्होंने घोड़े की गर्दन थपथपाने के लिए हाथ आगे बढ़ाया।
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लेकिन अगले ही पल…
घोड़े ने झटके से उनकी दाढ़ी पकड़ ली!
शास्त्री चीख उठे, “अरे छोड़ो! छोड़ो! ये क्या कर रहा है?”
घोड़ा उनकी दाढ़ी को भूसा समझकर जोर-जोर से खींच रहा था।
तेनाली हँसी दबाते हुए बोला, “शास्त्री जी, लगता है उसे लगा कि आप उसे खाना खिला रहे हैं!”
जब तक दीवार तोड़ी गई, शास्त्री की हालत खराब हो चुकी थी — उनकी दाढ़ी घोड़े के मुँह में थी, और चेहरा पूरी तरह लाल।
जैसे ही वे दरबार पहुँचे, पूरा दरबार हँसी से गूंज उठा!
राजा भी हँसते-हँसते बोले, “तेनाली, तुम तो हद करते हो!”
फिर राजा थोड़े गंभीर हुए, “पर यह सब तुमने क्यों किया?”
तेनाली ने विनम्र स्वर में कहा, “महाराज, शास्त्री जी ने हमेशा मेरा मज़ाक उड़ाया, कहा कि मैं सिर्फ बातों का ज्ञानी हूँ। इसलिए मैंने सोचा, उन्हें थोड़ा ‘घोड़े वाला ज्ञान’ दे दूँ।”
राजा ने हँसते हुए सिर हिलाया, “सच में, तुम्हारे उपाय अजीब होते हैं लेकिन शिक्षा गहरी होती है।”
सुब्बा शास्त्री ने सिर झुकाकर कहा, “महाराज, यह मेरी गलती थी। मैं अपने अभिमान में अंधा हो गया था। तेनाली रामा ने मुझे सबक सिखाया है, अब मैं कभी किसी का मजाक नहीं उड़ाऊँगा।”
तेनाली ने मुस्कराते हुए कहा, “शास्त्री जी, माफ कीजिएगा, मेरा इरादा अपमान का नहीं, शिक्षा का था।”
राजा बोले, “आज फिर तेनाली रामा ने हमें सिखाया कि अहंकार का घोड़ा जितना तेज़ दौड़े, उतनी ही जल्दी गिर भी पड़ता है।”
शिक्षा:
अहंकार मनुष्य की सबसे बड़ी कमजोरी है। जो दूसरों को नीचा दिखाता है, एक दिन स्वयं उपहास का पात्र बनता है। विनम्रता ही सच्ची बुद्धि का चिन्ह है।




