लघु कथाएँ | Hindi Short Moral Story
एक घना, हरा-भरा जंगल था — चारों ओर ऊँचे-ऊँचे पेड़, बहती नदियाँ, और पक्षियों की चहचहाहट से गूंजता माहौल। लेकिन उस सुंदर जंगल की शांति को बिगाड़ रखा था एक लालची और घमंडी शेर ने। वह हर दिन किसी न किसी जानवर का शिकार करता और अपनी दहाड़ से सबको डरा देता।
एक दिन, जब उसका पेट बहुत भूखा था, उसने सारी जंगल सभा बुलवाई और दहाड़ते हुए कहा, “सुनो ओ जंगल के प्राणियों! अब रोज़ मेरे लिए एक जानवर भेजा जाएगा। अगर तुम सब ऐसा नहीं करोगे, तो मैं हर दिन तुम सबको एक-एक करके फाड़ डालूंगा!”
बेचारे जानवर डर के मारे कांपने लगे। हिरण ने धीरे से कहा, “महाराज, हम आपकी आज्ञा मानते हैं।”
शेर ने मुस्कराकर कहा, “अच्छा है! अब रोज़ एक जानवर अपनी मर्जी से मेरे पास आएगा — तभी तुम्हारा जंगल बचेगा।”
इसके बाद हर दिन एक जानवर की बारी आती और वह शेर का शिकार बनता। धीरे-धीरे पूरे जंगल में मातम छा गया। किसी की बारी आने का डर सबको हर समय सताता रहता था।
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एक दिन वह बारी आई खरगोश की। बाकी जानवर उसके पास आए और दुखी होकर बोले, “भाई खरगोश, अब तो तू गया। तेरा मुकाबला उस दानव शेर से कैसे होगा?”
खरगोश मुस्कराया और बोला, “चिंता मत करो दोस्तों। मैं लौटकर ज़रूर आऊंगा। अब इस शेर के आतंक का अंत करना ही होगा।”
यह कहकर वह जानबूझकर बहुत देर से चला। जब सूरज ढलने को आया, तभी वह धीरे-धीरे शेर की गुफा के पास पहुँचा।
शेर गुफा के बाहर टहल रहा था। जैसे ही उसने खरगोश को देखा, उसकी आँखें गुस्से से लाल हो गईं।
वह गरजते हुए बोला, “ओ छोटे खरगोश! इतनी देर से क्यों आया? क्या मरने का शौक है तुझे?”
खरगोश ने हाथ जोड़कर डरने का नाटक किया, “महाराज, मेरी कोई गलती नहीं। मैं तो समय पर ही निकला था, पर रास्ते में… रास्ते में एक और शेर मिल गया!”
शेर ने हैरान होकर कहा, “क्या?! एक और शेर? और वो मेरे जंगल में?”
खरगोश ने सिर झुकाकर कहा, “जी महाराज, उसने तो कहा कि यह जंगल उसका है। मैं तो बोला — ‘हमारे राजा शेर हैं!’ पर उसने मुझे रोक लिया और कहा — ‘जा, अपने झूठे राजा से कह कि मैं असली जंगलराज हूँ!’”
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शेर की आँखों में आग सी जल उठी। वह दहाड़ा, “चल, अभी दिखा मुझे वो नीच! मैं अभी उसका अंत कर दूँगा!”
खरगोश बोला, “आइए महाराज, मैं आपको उसी के पास ले चलता हूँ। वह कुएँ के पास रहता है।”
दोनों उस पुराने कुएँ तक पहुँचे। आसमान में सूरज की आखिरी किरणें झिलमिला रही थीं, और कुएँ का पानी शांत था। खरगोश ने इशारा करते हुए कहा, “महाराज, वह रहा आपका दुश्मन — इस कुएँ में।”
शेर ने झांका, तो उसे अपनी ही परछाई दिखाई दी — वही आँखें, वही अयाल, वही दहाड़ने वाला चेहरा।
वह जोर से गुर्राया, “नीच शेर! अब देख, मैं क्या करता हूँ!”
इतना कहकर उसने जोर की दहाड़ लगाई। जवाब में कुएँ से भी वैसी ही दहाड़ गूंजी।
शेर और भड़क गया, “अच्छा! तू मेरी बराबरी करेगा?”
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खरगोश चुपचाप मुस्कराता रहा। और अगले ही पल —
धप्प!
शेर गुस्से में छलांग लगाकर कुएँ में कूद पड़ा।
पानी में तेज़ आवाज़ आई, और फिर सब शांत हो गया।
खरगोश धीरे से बोला, “महाराज, यही होता है जब कोई अपनी अक्ल का इस्तेमाल नहीं करता।”
फिर वह खुशी से उछलता हुआ जंगल में लौटा और सबको पूरी बात बताई।
पूरा जंगल खुशियों से झूम उठा। हिरण, बंदर, हाथी — सबने एक साथ नारा लगाया,
“जय हो बुद्धिमान खरगोश की!”
उस दिन के बाद से जंगल में शांति लौट आई। कोई किसी को नहीं डराता था, और सब मिल-जुलकर रहने लगे।
शिक्षा:
बुद्धिमानी और धैर्य, बल और गुस्से से कहीं ज़्यादा ताकतवर होते हैं। संकट के समय समझदारी ही सबसे बड़ी शक्ति है।




