अहंकारी मेंढक की कहानी | Motivational Story in Hind
एक घने, हरे-भरे जंगल के किनारे एक निर्मल नदी बहती थी। उस नदी के किनारे एक मेंढक अपने तीन छोटे-छोटे बच्चों के साथ रहता था। नदी का किनारा उनका छोटा सा संसार था — जहाँ सुबह की शुरुआत टर्र-टर्र की आवाज़ों से होती, दिन की गर्मी में वे ठंडे पानी में मस्ती करते और शाम को जब चाँद झिलमिलाती लहरों पर उतरता, तो मेंढक अपने बच्चों को रोमांचक किस्से सुनाया करता।
मेंढक सिर्फ उनका पिता नहीं, बल्कि उनका नायक था। वह अक्सर अपने बच्चों को कहानियाँ सुनाता — कैसे उसने एक बार एक साँप को डराकर भगा दिया था, कैसे उसने एक विशाल मछली से मुकाबला किया था, और कैसे वह जंगल का सबसे बहादुर मेंढक है। बच्चे उसे टकटकी लगाकर सुनते और हर बार उसके किस्से पर दंग रह जाते।
वे सोचते, “हमारे पिताजी तो दुनिया के सबसे ताकतवर हैं! उनसे बड़ा या बहादुर कोई नहीं हो सकता!”
एक दिन दोपहर को खेलते-खेलते तीनों मेंढक बच्चे नदी के किनारे से थोड़ा आगे निकल गए। वे उछलते-कूदते, मस्ती करते-करते जंगल की सीमा पार कर गए और पास के गाँव की ओर पहुँच गए। गाँव का माहौल उनके लिए बिल्कुल नया था। चारों तरफ लोगों की आवाज़ें, गायें, बकरियाँ और हिलते हुए ऊँचे पेड़ — यह सब देखकर वे रोमांचित थे।
तभी उनकी नज़र पड़ी — एक विशाल बैल खेत में खड़ा था। वह घास चबा रहा था, और हर बार जब वह सिर उठाता, तो उसके सींग धूप में चमक उठते। उसका शरीर इतना बड़ा था कि मेंढक बच्चों को लगा जैसे कोई पहाड़ चल रहा हो। जब उसने “हुंह्ह्ह!” की आवाज निकाली, तो धरती तक हिल गई।
तीनों बच्चे घबराकर एक झाड़ी के पीछे छिप गए। सबसे छोटा बोला, “ये… ये क्या है?”
दूसरा बोला, “शायद कोई राक्षस है!”
तीसरा बोला, “नहीं, शायद यह वही ‘बैल’ है जिसके बारे में पिताजी ने कहा था — लेकिन उन्होंने तो कभी नहीं बताया कि यह इतना बड़ा होता है!”
बैल ने फिर से हुंकार भरी और वे तीनों डर के मारे उछलते-कूदते वहाँ से भागे। जब तक वे अपने घर पहुँचे, उनकी साँसें फूल चुकी थीं।
मेंढक ने अपने बच्चों को इस हाल में देखा तो चौंक गया।
“अरे! क्या हुआ तुम्हें? ऐसे काँप क्यों रहे हो?”
बच्चों ने एक साथ बोलना शुरू किया —
“पिताजी! पिताजी! हमने आज तक का सबसे बड़ा जीव देखा! बहुत डरावना था!”
अहंकारी मेंढक की कहानी
मेंढक ने भौंहें चढ़ाईं, “कौन था वो? और मुझसे बड़ा था क्या?”
बच्चे बोले, “हाँ पिताजी! बहुत बड़ा! इतना बड़ा कि अगर आप उसके पास खड़े होते तो आपको कोई देख भी नहीं पाता!”
मेंढक के चेहरे पर मुस्कान गायब हो गई। उसकी आँखों में कुछ जलन सी झलकने लगी।
“क्या कहा तुमने? मुझसे बड़ा? वो भी इतना ज़्यादा?”
बच्चे बोले, “हाँ, सचमुच! उसके पैर ही हमारे तालाब जितने मोटे थे!”
मेंढक ने गर्व और अहंकार में सांस खींची और अपने शरीर को फुलाया।
“क्या वो इतना बड़ा था?”
बच्चे बोले, “नहीं पिताजी, उससे भी बहुत बड़ा!”
“अच्छा!” मेंढक ने फिर ज़ोर से सांस ली, उसका शरीर और फैल गया।
“अब? अब उसके बराबर लग रहा हूँ?”
बच्चे हँसने लगे, “नहीं पिताजी, आप तो उसके पैर के बराबर भी नहीं हैं!”
मेंढक को यह बात नागवार गुज़री। वह गुस्से से बोला,
“तुम्हें लगता है कि मैं किसी बैल से छोटा हूँ? मैं दिखाता हूँ तुम्हें!”
उसने और ज़ोर से सांस भरी, उसका पेट फूल गया, गाल तन गए, आँखें बाहर निकलने लगीं।
“अब? बताओ अब!”
बच्चे घबराकर बोले, “पिताजी, बस कीजिए! आप फट जाएँगे!”
लेकिन मेंढक पर अब अहंकार सवार था। वह सोच रहा था, “मैं इन बच्चों को दिखा दूँगा कि उनका पिता कितना बड़ा और ताकतवर है!”
अहंकारी मेंढक की कहानी
उसने फिर ज़ोर से सांस भरी…
उसका शरीर अब गोल होकर एक हरे गुब्बारे जैसा दिख रहा था।
उसकी आवाज़ भारी हो गई —
“अब बताओ! क्या अब मैं उस बैल जितना बड़ा नहीं हुआ?”
बच्चे चिल्लाए, “नहीं पिताजी, अब भी नहीं! वो तो आपसे बहुत बड़ा था!”
और तभी…
“धड़ाम!”
एक जोरदार धमाके के साथ मेंढक फट गया।
तीनों बच्चे कुछ पल के लिए वहीं खड़े रह गए — स्तब्ध, चुप, डरे हुए।
छोटे मेंढक की आँखों में आँसू आ गए। उसने धीरे से कहा,
“पिताजी तो सिर्फ हमें साबित करना चाहते थे कि वे सबसे बड़े हैं… पर अब वे रहे ही नहीं।”
दूसरे ने कहा,
“काश, वे समझ पाते कि बड़ा वही नहीं होता जो शरीर से बड़ा हो, बल्कि वो होता है जो अपने अहंकार को छोटा रखे।”
उस दिन तीनों बच्चों ने अपने पिता की गलती से एक बहुत बड़ी सीख ली। उन्होंने समझा कि जो इंसान या जीव अपने अहंकार को खुद से बड़ा बना लेता है, वह अंत में खुद को ही नष्ट कर देता है।
शिक्षा:
अहंकार और दिखावे की भावना हमें अपनी सीमाओं से आगे धकेल देती है, और यही विनाश का कारण बनती है। अपनी सच्चाई और क्षमता को पहचानना ही सबसे बड़ी समझदारी है।




