घंटी कौन बाँधेगा? | Motivational Story in Hindi
बहुत समय पहले की बात है। एक बड़े, शानदार और पुराने हवेली जैसे घर में सैकड़ों चूहे रहते थे। यह घर उनके लिए किसी जन्नत से कम नहीं था। रसोई में रोज़ स्वादिष्ट पकवान बनते, अनाज के बोरों में ढेरों दाने भरे रहते, और चूहों के खेलने-कूदने के लिए जगह भी बहुत थी। पूरे घर में उनकी चहचहाहट, भागदौड़ और शरारतों से रौनक रहती थी।
सुबह होते ही वे रसोई में घुस जाते — कोई चावल कुतरता, कोई रोटी का टुकड़ा खींचता, कोई मिठाई के डिब्बे में मुँह डाल देता।
और जब रात होती, तो थके-मांदे सब अपने-अपने बिलों में लौटकर खर्राटे भरते।
न कोई डर, न कोई चिंता। बस मौज ही मौज थी।
लेकिन एक दिन सब कुछ बदल गया।
जैसे किसी तूफान ने इस सुखी दुनिया पर हमला कर दिया हो।
वह दिन था जब एक भूखी बिल्ली उस घर में आ घुसी।
बिल्ली थी चालाक, धैर्यवान और शिकार में माहिर।
जब उसने इतने सारे चूहे देखे, तो उसकी आँखें चमक उठीं। उसके मुँह से लार टपकने लगी। उसने सोचा —
“वाह! अब तो मुझे इस घर से कहीं जाने की ज़रूरत ही नहीं। रोज़ का खाना यहीं मिलेगा!”
उस दिन से घर का माहौल बदल गया।
बिल्ली ने अंधेरे कोनों में अपने ठिकाने बना लिए। वह दिनभर वहाँ छिपी रहती और जैसे ही कोई चूहा ज़रा बाहर आता —
झपट्टा!
वह उसे पकड़ लेती और पल भर में चट कर जाती।
धीरे-धीरे चूहों की संख्या घटने लगी।
पहले जो रसोई में झुंड बनाकर आते थे, अब एक भी चूहा बाहर निकलने की हिम्मत नहीं करता था।
डर का माहौल हर कोने में फैला था।
किसी ने कहा, “रात को मत निकलना, बिल्ली घूम रही है!”
दूसरा बोला, “आज मोहन चूहा नहीं लौटा… शायद वही खा गई उसे…”
घंटी कौन बाँधेगा?
उनकी नींद उड़ चुकी थी।
अब उनकी ज़िंदगी में मज़ा नहीं, सिर्फ़ डर रह गया था।
आख़िरकार, एक दिन सब चूहों ने मिलकर एक महासभा बुलाई।
हॉल जैसे बड़े कमरे में सैकड़ों चूहे इकट्ठा हुए — बूढ़े, जवान, छोटे, मोटे, सब। माहौल गंभीर था।
सभा शुरू हुई।
एक ने कहा, “हमें घर छोड़ देना चाहिए!”
दूसरा बोला, “नहीं, हम सब मिलकर बिल्ली पर हमला करें!”
तीसरे ने कहा, “हमें कोई जादुई उपाय चाहिए…”
हर सुझाव पर किसी न किसी ने आपत्ति कर दी।
सभा में हंगामा मच गया। कोई किसी की सुन नहीं रहा था।
तभी, पीछे से एक कमजोर सी आवाज़ आई।
सबकी नज़र उस ओर मुड़ी —
वह एक बूढ़ा, सफ़ेद बालों वाला अनुभवी चूहा था, जो धीरे-धीरे खड़ा हुआ।
उसने कहा,
“भाइयों, मेरे पास एक बहुत अच्छा विचार है —
हम बिल्ली के गले में एक घंटी बाँध देते हैं।
जब भी वह चलेगी, घंटी बजेगी, और हम पहले से सावधान हो जाएंगे। कोई भी चूहा उसके झपट्टे में नहीं आएगा!”
घंटी कौन बाँधेगा?
यह सुनते ही पूरे हॉल में जैसे खुशी की लहर दौड़ गई।
“वाह! क्या बात कही दादाजी ने!”
“कमाल का उपाय है!”
“अब तो बिल्ली गई काम से!”
चूहे उछलने लगे, नाचने लगे, तालियाँ बजाने लगे।
कुछ ने तो ढोल तक पीट दिए।
लेकिन तभी, एक यथार्थवादी चूहा — जो हमेशा कम बोलता था, मगर गहराई से सोचता था — खड़ा हुआ।
उसने गंभीर आवाज़ में कहा,
“सुनो भाइयों… विचार सच में शानदार है।
पर एक सवाल है — बिल्ली के गले में घंटी बाँधेगा कौन?”
कमरा एकदम शांत हो गया।
चारों तरफ़ सन्नाटा फैल गया।
सैकड़ों चूहे एक-दूसरे की तरफ़ देखने लगे।
किसी ने नज़रें झुका लीं, कोई अपने पंजे से सिर खुजाने लगा, कोई धीरे से पीछे हट गया।
घंटी कौन बाँधेगा?
काफी देर तक कोई आवाज़ नहीं आई।
आख़िर एक बूढ़ी चूहिया ने कहा,
“विचार जितना सुंदर है, उतना ही असंभव भी। बिल्ली के पास जाना मतलब मौत को न्योता देना।”
उसी पल, सभा स्थल के पास से “छपाक…छपाक…” सी हल्की आवाज़ आई।
किसी ने धीरे से कहा — “श्श्श… वो… बिल्ली…”
और इससे पहले कि कोई कुछ समझे, सब चूहे तितर-बितर हो गए!
जो जिस बिल में घुस सकता था, वहीं छिप गया।
सभा वहीं खत्म हो गई।
घंटी का विचार अधूरा रह गया।
और चूहे फिर उसी डर में जीने लगे —
जहाँ विचार तो बहुत थे, पर करने वाला कोई नहीं था।
शिक्षा:
सिर्फ़ सलाह देना या योजना बनाना आसान होता है, पर असली बुद्धिमानी उसमें है जो उन योजनाओं को अमल में लाने का साहस रखे। बिना कर्म के कोई विचार सफल नहीं होता।




