जंगल की सीख | Moral Stories in Hindi
घना, हरा-भरा जंगल।
ऊँचे-ऊँचे पेड़ों की पत्तियों से छनकर आती सुनहरी धूप।
चारों तरफ़ पंछियों का चहचहाना और हवा में ताज़ी मिट्टी की ख़ुशबू।
जंगल के बीचों-बीच एक विशाल पहाड़ था।
उसकी तलहटी में एक झरना कल-कल करता बहता था — इतना साफ़ कि उसमें आसमान और पेड़ों का प्रतिबिंब झिलमिला उठता था।
जब धूप की किरणें उस पर पड़तीं, तो पानी की हर बूँद हीरे-सी चमकती थी।
वो झरना ही पूरे जंगल की जान था — हाथी, हिरण, बाघ, बंदर, सब वहीं आकर पानी पीते थे।
एक दिन दोपहर के समय, जब सूरज आग उगल रहा था, हवा भी गर्म तवे जैसी लग रही थी,
तब जंगल का राजा शेर अपने ठिकाने से निकला।
उसकी जीभ सूख रही थी, गला जैसे रेत से भर गया था।
“उफ़्फ़! आज तो बड़ी भयंकर प्यास लगी है,” उसने बड़बड़ाते हुए कहा और झरने की ओर चल पड़ा।
जैसे ही वह झरने के पास पहुँचा, उसने देखा — पानी ठंडा, मीठा और बेहद साफ़ था।
वह खुशी से बोला, “वाह! यही तो चाहिए था!”
वह झुककर पानी पीने ही वाला था कि तभी—
झाड़ियों के पीछे से घर्र-घर्र की आवाज़ आई।
अचानक एक मोटा-तगड़ा जंगली सूअर वहाँ आ गया।
उसकी नाक लाल, दाँत तेज़ और चेहरा अकड़ से भरा हुआ था।
जंगल की सीख
सूअर भी झरने की ओर बढ़ा और बोला,
“अरे वाह, कितना ठंडा पानी है! आज मैं सबसे पहले पीऊँगा।”
शेर ने भौंहें चढ़ाईं,
“क्या कहा तूने? पहले तू पानी पिएगा? भूल मत — मैं हूँ जंगल का राजा!”
सूअर ने हँसते हुए कहा,
“राजा हो या नहीं, मुझे परवाह नहीं। जो पहले आता है, वो पहले पीता है — ये जंगल का नियम है!”
शेर गरजा, “नियम मैं बनाता हूँ!”
सूअर ने भी दाँत दिखाते हुए जवाब दिया, “और तोड़ने वाला मैं हूँ!”
बस फिर क्या था — दोनों के बीच तकरार शुरू हो गई।
शेर ने गुस्से में दहाड़ मारी —
“गुर्र्र्र्र्र्र!”
उसकी आवाज़ से पेड़ों की डालियाँ हिल गईं, चिड़ियाँ डरकर उड़ गईं।
पर सूअर भी पीछे हटने वाला नहीं था।
उसने भी पूरी ताक़त से अपनी टाँगें ज़मीन पर पटकीं और कहा,
“चलो आ जाओ, आज देखते हैं कौन ताक़तवर है!”
शेर ने छलाँग लगाई, सूअर झपटा,
दोनों झरने के पास धूल उड़ाते हुए भिड़ गए।
शेर के नुकीले पंजे हवा चीर रहे थे, सूअर अपने दाँतों से बचाव कर रहा था।
पेड़-पौधे हिल रहे थे, पानी छलक रहा था, और पूरा जंगल इस लड़ाई की आवाज़ से गूँज उठा।
इसी बीच, आसमान में कुछ भूखे गिद्ध उड़ते हुए आ पहुँचे।
उन्होंने नीचे देखा — शेर और सूअर लड़ रहे थे, दोनों ज़ख्मी हो रहे थे।
जंगल की सीख
एक गिद्ध बोला,
“वाह! आज तो दावत है। जो भी मरेगा, हमें उसका मांस मिलेगा!”
दूसरे ने कहा,
“हाँ, थोड़ी देर इंतज़ार करो। दोनों एक-दूसरे को खत्म कर देंगे, फिर हम मज़े से भोज करेंगे।”
वे झरने के ऊपर मंडराने लगे, अपने तीखे पंजे फैलाए हुए।
लड़ाई अब लंबी हो चुकी थी।
दोनों थक गए थे, हाँफ रहे थे, शरीर पर खरोंचें थीं।
तभी शेर ने ऊपर देखा —
आसमान में गिद्ध गोल-गोल चक्कर काट रहे थे।
एक पल में ही शेर को सब समझ आ गया।
उसने ज़ोर से कहा,
“भाई सूअर, ज़रा ऊपर देखो!”
सूअर ने हाँफते हुए सिर उठाया, “क्यों, क्या हुआ?”
शेर बोला,
“देखो, वो गिद्ध हमारी मौत का इंतज़ार कर रहे हैं। अगर हम यूँ ही लड़ते रहे, तो शायद हम दोनों ही खत्म हो जाएँगे — और उन गिद्धों का पेट भर जाएगा।”
सूअर ने आसमान की ओर देखा — और उसकी आँखें चौड़ी हो गईं।
वो कुछ देर चुप रहा, फिर बोला,
“तुम सही कह रहे हो, शेर भाई। ये लड़ाई हमें कुछ नहीं देगी, बस मौत करीब लाएगी। क्यों न हम दोस्ती कर लें और साथ में पानी पी लें?”
जंगल की सीख
शेर ने राहत की साँस ली,
“हाँ भाई, ये सबसे समझदारी भरा फैसला होगा।”
दोनों ने लड़ाई रोक दी।
झरने के पास जाकर, एक-दूसरे की ओर मुस्कुराए।
पहले सूअर ने पानी पिया, फिर शेर ने भी अपना गला तर किया।
ठंडा मीठा पानी उनके मन को ठंडक दे गया।
उन्होंने एक-दूसरे से कहा,
“अब से ताक़त की नहीं, समझदारी की जीत होगी।”
ऊपर उड़ते गिद्ध मायूस होकर बोले,
“उफ़्फ़! आज तो हमारी दावत गई।”
और वे निराश होकर उड़ गए।
शेर और सूअर दोनों साथ-साथ झरने से लौटे —
अब वे दुश्मन नहीं, बल्कि दोस्त बन चुके थे।
शिक्षा:
आपसी झगड़ों से हमेशा नुकसान ही होता है। समय रहते समझदारी दिखाना और मिल-जुलकर रहना ही असली बुद्धिमानी है।




