सोने का अंडा | Moral Stories in Hindi
बहुत समय पहले की बात है।
हरे-भरे खेतों और मिट्टी की खुशबू से महकते एक छोटे से गाँव में रामू नाम का किसान रहता था।
उसकी पत्नी का नाम था सीता।
दोनों का जीवन सीधा-सादा था — ना कोई दिखावा, ना कोई आराम।
सुबह सूरज के उगने से पहले दोनों खेत की ओर निकल जाते, और तब तक काम करते रहते जब तक आसमान पर लालिमा ढल न जाए।
शाम को थके-मांदे घर लौटते, फिर मिट्टी के चूल्हे पर रोटी सेंकते और एक-दूसरे को देखकर मुस्कराते।
सीता अक्सर कहती,
“रामू, ज़िंदगी भले कठिन है, पर मेहनत की रोटी में सुकून है।”
रामू भी सिर हिलाता, “हाँ सीता, लेकिन काश थोड़ा धन होता, तो हम भी बिना चिंता के जीते।”
उनके दिल में कोई लालच नहीं था, बस एक छोटी-सी उम्मीद थी — थोड़ा बेहतर जीवन जीने की।
एक दिन रामू अपनी फसल लेकर पास के शहर के बाजार गया।
वहाँ उसने देखा — कुछ व्यापारी बड़े-बड़े टोकरे लिए बैठे थे, जिनमें मुर्गियाँ और अंडे रखे थे।
लोग उन अंडों को अच्छे दामों में खरीद रहे थे।
रामू रुक गया।
“अरे वाह,” उसने सोचा, “मुर्गियाँ पालना तो अच्छा धंधा है! अंडे बेचकर लोग कितना कमा रहे हैं।”
सोने का अंडा
उसकी आँखों में उम्मीद की चमक आ गई।
उसने अपनी छोटी-सी जमा पूंजी से कुछ मुर्गियाँ खरीदीं और घर ले आया।
सीता हैरान हुई, “अरे, ये सब क्या है?”
रामू मुस्कराया, “हम भी अब मुर्गियाँ पालेंगे। देखना, जल्द ही किस्मत बदल जाएगी!”
सीता हँस पड़ी, “अगर मेहनत से कुछ बने तो मैं भी साथ दूँगी।”
दोनों ने मिलकर घर के आँगन में लकड़ी, बांस और सूखी पत्तियों से एक मजबूत दड़बा (मुर्गियों का घर) बनाया।
सीता हर रोज़ उन्हें दाना-पानी देती, और रामू बड़े प्रेम से उनके लिए जगह साफ़ करता।
हर सुबह जब सूरज की पहली किरण पड़ती, दोनों दड़बे में झाँकते —
“देखें आज कितने अंडे मिले!”
कभी तीन मिलते, कभी पाँच।
सीता हँसते हुए कहती, “देखो-देखो, हमारी मुर्गियाँ भी मेहनती हैं।”
रामू गर्व से जवाब देता, “हाँ, जैसे उनके मालिक!”
एक दिन सुबह जब सीता दड़बे में झाँकी, तो उसकी आँखें फैल गईं।
वहाँ सामान्य अंडों के बीच एक चमकता हुआ सुनहरा अंडा पड़ा था!
वह चौंककर बोली, “रामू! ये देखो! ये… ये तो सोने का अंडा है!”
रामू दौड़ता हुआ आया, “क्या? सच में?”
सोने का अंडा
दोनों ने ध्यान से देखा — वह सचमुच सोने का अंडा था, जो धूप में चमक रहा था।
रामू की आँखें अविश्वास में चमक उठीं।
“ये… ये कोई मज़ाक तो नहीं?”
“नहीं रामू, ये असली सोना है!”
रामू तुरंत अंडा लेकर गाँव के सुनार के पास गया।
सुनार ने अंडे को हाथ में लिया, परखा और बोला, “अरे किसान! ये तो खरा सोना है!”
रामू खुशी से उछल पड़ा।
“तो ये सपना नहीं था! हमारी मुर्गी तो सोने के अंडे देती है!”
अब हर सुबह रामू और सीता की आँखें उम्मीद से चमकतीं।
हर दिन मुर्गी एक नया सोने का अंडा देती, और दोनों उसे बेचकर धीरे-धीरे धनवान बनते गए।
कुछ ही महीनों में उनके घर की झोपड़ी की जगह पक्के मकान ने ले ली।
सीता के गले में सोने की माला थी, और रामू के कपड़े अब फटे नहीं थे।
गाँववाले अब उन्हें इज़्ज़त से “रामू भैया” कहने लगे।
सीता अक्सर हँसकर कहती,
“देखो रामू, हमारी मेहनत रंग लाई! अब हमें किसी चीज़ की कमी नहीं।”
रामू सिर उठाकर आसमान देखता और कहता,
“सच कहा, सीता। ये तो किसी चमत्कार से कम नहीं।”
सोने का अंडा
लेकिन धीरे-धीरे सीता के मन में लोभ जन्म लेने लगा।
एक रात उसने कहा,
“सुनो रामू, रोज़ एक-एक अंडा मिलता है। सोचो, अगर हम उस मुर्गी के पेट से सारे अंडे एक साथ निकाल लें, तो एक ही दिन में अमीर बन जाएंगे!”
रामू चौंक गया।
“क्या पागलपन की बात कर रही हो! अगर वो मर गई तो?”
सीता ने कहा, “अरे नहीं-नहीं, ऐसा कुछ नहीं होगा। अंदर तो ज़रूर बहुत सारे सोने के अंडे होंगे। बस हमें थोड़ा हिम्मत करनी है।”
रामू ने मना तो किया, लेकिन रातभर उसे भी यही ख्याल सताता रहा।
“सच कह रही है सीता… अगर ऐसा हो जाए तो?”
लोभ ने धीरे-धीरे उनकी समझ पर पर्दा डाल दिया।
अगले दिन रामू बाजार गया और एक बड़ा तेज़ चाकू खरीदा।
रात हुई। सब कुछ शांत था। मुर्गियाँ सो रहीं थीं।
रामू और सीता दबे पाँव दड़बे में पहुँचे।
सीता फुसफुसाई, “धीरे से, कोई सुन न ले।”
रामू ने काँपते हाथों से सोने का अंडा देने वाली मुर्गी को पकड़ा।
“चलो, अब अमीरी का दरवाज़ा खुलने वाला है,” उसने कहा।
सोने का अंडा
लेकिन जैसे ही उसने चाकू चलाया…
मुर्गी ने कुंउँऽऽ की दर्द भरी आवाज़ निकाली — और फिर सब ख़त्म।
सीता की आँखें डर से फैल गईं।
रामू ने काँपते हाथों से पेट खोला —
अंदर कुछ भी नहीं था।
न सोने के अंडे, न खजाना।
बस खून और पछतावा।
सीता सिसक पड़ी, “हमने क्या कर दिया?”
रामू ने सिर पकड़ लिया, “हमने अपने ही भाग्य को मार डाला!”
सुबह जब सूरज उगा, तो दड़बा खाली था।
वो मुर्गी, जो रोज़ उन्हें सोने के अंडे देती थी, अब हमेशा के लिए चली गई थी।
रामू और सीता फिर से गरीब हो गए — लेकिन इस बार उनकी गरीबी से ज़्यादा गहरी थी उनकी गलती की चोट।
वे हर दिन उस दड़बे के पास बैठकर सोचते —
“अगर हम थोड़ा सब्र करते… तो शायद आज भी खुश होते।”
शिक्षा:
लालच बुरी बला है। ज्यादा पाने की चाह में कभी-कभी इंसान अपने पास की संपत्ति भी खो देता है। संतोष में ही सच्चा सुख है।




