बच्चो के लिए कहानियाँ | Hindi Story for Kids
बहुत समय पहले की बात है। एक छोटे से गाँव में एक जुलाहा रहता था — सीधा-सादा, मेहनती, लेकिन थोड़ा भोला-भाला भी। उसका काम था रुई से सूत कातना और कपड़े बुनना। एक दिन सुबह-सुबह वह अपने घर से निकला, सिर पर रुई की पोटली रखी और सोचते हुए बोला, “आज जल्दी जाकर काम शुरू कर दूँगा, शाम तक सारा सूत तैयार हो जाएगा।”
वह चलता-चलता नदी किनारे पहुँचा। सूरज तेज़ चमक रहा था और गर्मी से उसका गला सूख गया। उसने सोचा, “थोड़ी देर बैठकर आराम कर लूँ, फिर आगे बढ़ूँगा।”
वह एक बड़े पत्थर पर बैठा ही था कि तभी तेज़ हवा चलने लगी — “हूँऽऽऽ… हुँऽऽऽ…”
देखते ही देखते उसकी पोटली खुल गई और सारी रुई हवा में उड़ गई। सफ़ेद रूई के गोले आसमान में ऐसे उड़ रहे थे जैसे बादलों के छोटे टुकड़े तैर रहे हों।
जुलाहा घबरा गया, “अरे! अरे! मेरी रुई! रुको! ओ रुई माँ, कहाँ जा रही हो!”
वह दौड़ा, कूदा, हाथ हिलाए, पर रुई कहाँ रुकने वाली थी? वो तो फुर्र से उड़ गई।
थका-हारा जुलाहा वहीं बैठ गया और सिर पकड़ लिया। “अब घर जाऊँगा तो पत्नी क्या कहेगी? कहेगी — ‘सारा माल उड़वा लाया, अब क्या कमाई होगी?’ हाय रे मेरी किस्मत!”
फिर उसे अचानक ख्याल आया, “जब रुई उड़ रही थी, तो वो कैसी आवाज़ कर रही थी? ‘फुर्र-फुर्र’! हाँ, बस यही सही रहेगा।”
उसने सोचा कि अगर वह यही बोलता रहा तो कोई उससे कुछ नहीं पूछेगा। तो वो चलता गया और ज़ोर-ज़ोर से बोलता गया — “फुर्र-फुर्र! फुर्र-फुर्र!”
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थोड़ी दूर गया ही था कि सामने एक आदमी जाल लेकर चिड़ियाँ पकड़ रहा था। जैसे ही जुलाहे की “फुर्र-फुर्र” आवाज़ आई, सारी चिड़ियाँ उड़ गईं।
वो आदमी गुस्से से चिल्लाया, “अरे ओ पागल! तेरा दिमाग़ खराब है क्या? तूने मेरी सारी चिड़ियाँ उड़ा दीं! अब बोलो, मुझे कौन भरेगा नुकसान? अबसे बोलना ‘पकड़ो-पकड़ो’, समझा?”
बेचारा जुलाहा डर गया। “जी… जी ठीक है भैया, पकड़ो-पकड़ो!” कहता हुआ आगे बढ़ गया।
अब वो हर कदम पर “पकड़ो-पकड़ो! पकड़ो-पकड़ो!” चिल्लाता जा रहा था।
थोड़ी दूर आगे कुछ चोर पेड़ के नीचे बैठे रुपये गिन रहे थे। उन्होंने जैसे ही सुना, “पकड़ो-पकड़ो!” तो समझे कि कोई सिपाही उन्हें पकड़ने आ गया।
वे झटपट उठे, जुलाहे को पकड़ लिया और बोले, “अबे! तू हमें फँसाने आया है क्या? पुलिस का आदमी है तू?”
डरे हुए जुलाहे ने कहा, “न-नहीं भैया, गलती हो गई।”
चोर बोले, “अब से बोल ‘रखो-रखो’, वरना यही यहीं गाड़ देंगे।”
जुलाहा बोला, “जी भैया, अब बस ‘रखो-रखो’ बोलूँगा।”
अब वो आगे चला और हर कदम पर बोलता रहा, “रखो-रखो! रखो-रखो!”
थोड़ी देर में वो एक गाँव से गुज़रा जहाँ हैजा फैला था। लोग अपने प्रियजनों का अंतिम संस्कार कर रहे थे। वातावरण गंभीर था, हर तरफ़ रोना-धोना।
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तभी सबने सुना — “रखो-रखो! रखो-रखो!”
लोगों ने गुस्से में उसे घेर लिया — “अरे बदतमीज़! क्या कह रहा है तू? यहाँ हम शोक मना रहे हैं और तू मज़ाक उड़ा रहा है?”
जुलाहा काँप गया, “न-नहीं, मेरा वो मतलब नहीं था…”
तभी एक बुज़ुर्ग बोला, “ऐसे वक्त में कहना चाहिए, ‘बड़ा दुख है।’ समझे?”
“जी बाबा, अब यही बोलूँगा,” उसने कहा।
अब जुलाहा चलता गया और बोलता गया — “बड़ा दुख है, बड़ा दुख है…”
थोड़ी देर में वो एक बारात के बीच पहुँच गया। वहाँ लोग ढोल-नगाड़े बजा रहे थे, नाच रहे थे, खुशियाँ मना रहे थे।
जुलाहा बीच में से निकला और बोला — “बड़ा दुख है! बड़ा दुख है!”
बारातियों ने सोचा कि ये अपशकुन बोल रहा है!
सबने घेर लिया — “अरे! हमारे सुहाग के दिन को क्यों अशुभ बना रहा है?”
जुलाहा डर गया और हाथ जोड़कर बोला, “भैया, माफ कर दो! मुझे किसी ने ये बोलने को कहा था।”
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बारातियों के मुखिया ने कहा, “अबसे बोलना चाहिए — ‘भाग्य में हो तो ऐसा सुख मिले।’ समझे?”
“जी, जी! अब यही बोलूँगा।”
अब वो थका हुआ, रात को एक पेड़ के नीचे लेट गया और सो गया। उसे याद आया, पत्नी ने कहा था — “जहाँ रात हो जाए, वहीं रुक जाना।”
सुबह जब उसकी आँख खुली, उसने देखा — वो अपने ही घर में है!
पत्नी पानी डाल रही थी और बोली, “उठो भी! फिर काम पर नहीं जाओगे क्या?”
जुलाहा मुस्कुराया, हाथ जोड़कर बोला, “भाग्य में हो तो ऐसा सुख मिले!”
पत्नी पहले तो भौंचक्की रह गई, फिर हँसने लगी।
उस दिन के बाद से जुलाहा बहुत समझदार हो गया। उसने सीखा कि हर बात सोच-समझकर बोलनी चाहिए, क्योंकि हर जगह एक ही बात सही नहीं होती।
धीरे-धीरे उसका यही बुद्धिमान स्वभाव उसे सबका प्रिय बना गया। गाँव में लोग कहते, “अब हमारा जुलाहा तो बड़ा सयाना हो गया है!”
शिक्षा:
हर बात का एक समय और स्थान होता है। सोच-समझकर बोले गए शब्द जीवन बना सकते हैं, और बिना सोचे बोले शब्द मुसीबत मोल दे सकते हैं।




