बच्चो के लिए कहानियाँ | Story for Kids in Hindi
बहुत समय पहले, एक हरे-भरे जंगल में दो अनोखे दोस्त रहते थे —
एक था तेज़तर्रार, घमंडी खरगोश, और दूसरा था शांत, धैर्यवान कछुआ।
दोनों में दिन-रात का फर्क था।
खरगोश जहाँ हर काम “फटाफट” करना पसंद करता था, वहीं कछुआ हर काम सोच-समझकर, धीरे-धीरे करता था।
लेकिन अजीब बात ये थी कि फिर भी दोनों दोस्त थे।
खरगोश पेड़ की डाल से कूदकर नीचे आया और कछुए को धीरे-धीरे चलते देखा।
उसने हँसते हुए कहा, “अरे कछुए भाई, तुम्हें देखकर तो लगता है कि अगर सूरज तुम्हारे साथ दौड़ लगाए, तो वो तीन बार उगकर ढल जाए और तुम अभी भी रास्ते में ही रहो!”
कछुआ शांत स्वर में बोला, “सही कहा, खरगोश भाई, मैं धीमा तो हूँ, पर रुकता नहीं। और शायद यही बात मुझे तुमसे आगे ले जा सकती है।”
खरगोश ठहाका लगाकर हँसा, “हा हा हा! तुम और मुझसे आगे? अरे तुम तो तब तक मंज़िल तक पहुँचोगे जब तक मैं तीसरी बार चक्कर काट आऊँगा!”
कछुए ने मुस्कराते हुए कहा, “क्यों न फिर इसे आज़माकर देख लें? एक दौड़ लगा लो मेरे साथ।”
खरगोश की आँखें चमक उठीं। “वाह! मज़ा आ जाएगा। ठीक है, कल सुबह दौड़ होगी! मैं तो तैयार हूँ… पर तुम्हें शर्म नहीं आएगी हारकर?”
कछुआ बस बोला, “शायद नहीं, क्योंकि कोशिश करने वाले कभी हारते नहीं, भाई।”
Story for Kids in Hindi
पूरा जंगल उत्साह से भरा हुआ था।
गिलहरियाँ पेड़ों से झाँक रही थीं, तोते फड़फड़ा रहे थे, और बंदर अपनी टहनियों से “दौड़! दौड़!” चिल्ला रहे थे।
रेफरी बना जंगल का समझदार चूहा 🐭।
उसने सबको शांत किया और बोला,
“सावधान! तैयार… और दौड़ो!”
खरगोश बिजली की तरह भागा। उसके पैर ज़मीन को छूते भी नहीं थे।
कछुआ वहीं अपनी चाल में… “धीरे-धीरे… पर लगातार।”
जंगल के जानवरों ने तालियाँ बजाईं, पर खरगोश तो कुछ ही पलों में सबकी आँखों से ओझल हो गया।
खरगोश मन ही मन बोला, “ये तो मज़ाक बन गया। बेचारा कछुआ तो शायद अभी तक शुरुआती लाइन पर ही होगा!”
वो थोड़ा आगे गया, एक पेड़ की छाँव मिली — ठंडी हवा चल रही थी, घास हरी-हरी थी।
“थोड़ा आराम कर लूँ… जब तक कछुआ आधा भी नहीं आया होगा।”
वो घास पर लेट गया… और कब उसकी आँखें बंद हुईं, उसे पता भी नहीं चला।
Story for Kids in Hindi
वो पसीने से तर-बतर था, पर उसके कदम नहीं रुके।
हर बार जब पैर थकता, वो खुद से कहता, “बस थोड़ा और… बस एक कदम और…”
उसकी साँसे भारी थीं, पर मन शांत था।
धीरे-धीरे, वही कछुआ उस पेड़ के पास पहुँचा जहाँ खरगोश सो रहा था।
उसने देखा, खरगोश खर्राटे ले रहा है।
कछुआ मुस्कुराया, “लगता है दौड़ मेरे हक में जा रही है।”
और वो आगे बढ़ गया — बिना किसी रुकावट के।
सूरज ढलने को था।
खरगोश ने आँखें मलते हुए कहा,
“अरे! मैं तो सो गया था! अब तो कछुआ काफी पीछे होगा, मैं अभी पकड़ लूँगा।”
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वो पूरे जोर से दौड़ा — जैसे हवा फाड़कर जा रहा हो।
पर जब वो बरगद के पास पहुँचा, तो जो देखा, उस पर उसका विश्वास ही नहीं हुआ।
कछुआ वहाँ पहले से खड़ा था — थका हुआ ज़रूर, पर चेहरे पर एक शांत मुस्कान लिए।
उसने कहा, “खरगोश भाई, देखा? धीरे चलने वाला भी मंज़िल तक पहुँच सकता है, अगर वो कभी रुके नहीं।”
खरगोश सिर झुकाकर बोला, “हाँ कछुए भाई, आज समझ आया… गति नहीं, निरंतरता जीत दिलाती है।”
दोनों ने हँसकर हाथ मिलाया।
उस दिन के बाद खरगोश ने कभी किसी को उसकी धीमी चाल पर नहीं हँसाया।
शिक्षा:
जो चीज़ तुम्हारी नहीं है, उस पर जबरदस्ती कब्ज़ा करना खुद के लिए भी नुकसानदायक होता है।




