🏹 राजा और वज़ीर चिड़ा | King Bird and Minister 🕊️

अलिफ लैला की कहानियाँ | Alif Laila Stories | Hindi Story of King

एक बार की बात है, उड़ते बादलों और पहाड़ी हवाओं से घिरे एक विशाल जंगल में चिड़ियों का एक बड़ा समुदाय रहता था। उसी समुदाय में एक छोटा-सा चिड़ा भी था—दिखने में मामूली, पर दिल का बहुत साफ और स्वभाव से बेहद मेहनती।

यह चिड़ा हर सुबह सूरज निकलने से पहले उठता, अपने पंख फड़फड़ाकर खुद को तैयार करता और फौरन चिड़ियों के राजा, भव्य मोर, से मिलने चला जाता। वह पूरे दिन मोर की सेवा करता—कभी उसके लिए फल लाता, कभी उसके आसपास जमा गिरे पत्तों को साफ करता, और कभी मोर की समस्याएँ सुनकर समाधान भी सुझाता।

धीरे-धीरे, सभी चिड़ियों ने उसकी निष्ठा को पहचाना और उसे पसंद करने लगीं। वे कहतीं,
“अरे देखो, यह छोटा-सा चिड़ा कितना दिल से काम करता है!”
“सच्चे दिल से सेवा करना किसी भी बड़े काम से बढ़कर होता है।”

समय बीतता गया।

एक दिन पहाड़ की चोटी पर चिड़ियों ने एक बड़ी सभा बुलाई। चारों ओर शाखों पर बैठी चिड़ियाँ चहचहा रही थीं—कभी उत्साह से, कभी जिज्ञासा से।

एक बुजुर्ग बुलबुल बोली,
“हम सब अलग-अलग हैं—हमारी आकृतियाँ अलग, हमारी आवाज़ें अलग, हमारी उड़ान अलग। अगर हमारा एक राजा होता, तो हम सब एक हो सकते हैं!”

सभा में सन्नाटा फैल गया।

तभी वह निष्ठावान चिड़ा आगे बढ़ा और नम्र आवाज़ में बोला,
“मेरी राय में हमारा राजा मोर होना चाहिए। वह सिर्फ सुंदर ही नहीं—बल्कि बुद्धिमान, न्यायप्रिय और सबका ख्याल रखने वाला है।”

यह सुनते ही सब चिड़ियाँ फड़फड़ाईं और एक सुर में बोलीं,
“हाँ! मोर ही हमारा राजा बनेगा!”

Hindi Story of King

राजा मोर ने गर्व और खुशी से अपना सीना ऊँचा किया। और उसने उसी सभा में घोषणा कर दी,
“और हमारा वज़ीर होगा—यह छोटा पर बुद्धिमान चिड़ा!”

चिड़ा शर्माते हुए बोला,
“महाराज, यह मेरे लिए सम्मान है। मैं आपके लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दूँगा।”

और इस तरह वह वज़ीर बन गया।

दिन बीते।
पर एक दिन कुछ अजीब हुआ।

मोर सुबह-सुबह चिड़े का इंतजार कर रहा था, पर चिड़ा नहीं आया। मोर बेचैन होकर टहलते हुए बोला,
“आज यह कहाँ रह गया? यह पहली बार देर कर रहा है…”

कुछ देर बाद चिड़ा घबराया हुआ, तेजी से उड़ता हुआ आया।
मोर चिंता से बोला,
“वज़ीर, तुम देर से आए हो। क्या हुआ? तुम ठीक तो हो?”

चिड़े ने थके हुए स्वर में कहा,
“महाराज… आज मैं आते समय बहुत डर गया। मेरे घोंसले के पास एक शिकारी आया था। उसने जाल बिछाया था और उन जालों के बीच दाने रखे थे। थोड़ी ही देर में एक सारस और उसकी पत्नी उस जाल में फँस गए। शिकारी ने दोनों को पकड़ लिया। मैं सब देखता रहा… लेकिन कुछ कर नहीं पाया। डर इतना बढ़ गया कि मेरे मन में आया कि मैं अपना घर छोड़ दूँ।”

मोर ने गहरी सांस लेते हुए कहा,
“देखो वज़ीर, डर के कारण घर छोड़ देना समझदारी नहीं। किस्मत का लिखा किसी से नहीं बचता। कहीं भी जाओ, जो होना होगा—वह होकर रहेगा। अपने घोंसले में रहो, लेकिन सावधानी के साथ।”

चिड़े ने सिर हिलाकर कहा,
“ठीक है महाराज, मैं आपकी बात मानता हूँ।”

अगले दिन वज़ीर चिड़ा राजकाज में व्यस्त था। तभी उसने देखा कि दो छोटी चिड़ियाँ जोर-जोर से झगड़ रही थीं।
एक चिड़िया चिल्लाई,
“ये मेरे पेड़ के पत्ते खा रही थी!”
दूसरी बोली,
“झूठ! पहले इसने मुझे धक्का दिया!”

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चिड़े ने सोचा,
“मैं वज़ीर हूँ, यह मेरा कर्तव्य है कि झगड़ा सुलझाऊँ।”

वह उड़कर नीचे उतरा और बोला,
“अरे-अरे, झगड़ा क्यों कर रही हो? आओ, मैं बात साफ करता हूँ।”

लेकिन जैसे ही वह उन्हें शांत कराने गया—

धप्प!
वह सीधे शिकारी के जाल में फँस गया।

जाल बंद हुआ।
चिड़ा फड़फड़ाने लगा,
“हाय! यह क्या हो गया!”

छिपकर खड़ा शिकारी खुशी से उछल पड़ा,
“वाह! यह तो बड़ा मोटा और सुंदर चिड़ा है। आज तो मज़ा आ गया। बड़ी कीमत मिलेगी!”

जाल में फँसे चिड़े ने खुद से कहा,
“मैं उसी जाल में फँसा हूँ… जिससे डरकर भागना चाहता था।
मोर सही था—किस्मत का लिखा कोई नहीं बदल सकता।
न मैं, न राजा मोर।
जो होना था, वही हुआ।”

वह दुखी था, पर सच्चाई समझ चुका था।

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