अलिफ लैला की कहानियाँ | Alif Laila Stories
एक हरे-भरे गाँव में एक शेख रहता था। शेख अपने मुर्गों और मुर्गियों की देखभाल ऐसे करता था जैसे कोई अपने बच्चों की देखभाल करता है। उसके आँगन में अलग-अलग रंगों और नस्लों के मुर्गे-मुर्गियाँ थे—किसी का रंग सोने जैसा चमकदार, किसी का चाँदी जैसा, किसी की कलगी ऊँची और किसी की पूँछ हवा में लहराती हुई।
पर इन सब में एक मुर्गा खास था।
उम्र में बड़ा, अनुभव में उससे भी बड़ा।
गाँव वाले उसे “बूढ़ा मुर्गा” कहते थे, लेकिन उसके भीतर की बुद्धिमानी इतनी गहरी थी कि कोई भी उससे बहस करने की हिम्मत नहीं करता था।
एक सुबह सूरज की हल्की किरणें खेतों पर पड़ रही थीं। बूढ़ा मुर्गा आराम से दाने चुगने निकल पड़ा। धीरे-धीरे वह आगे बढ़ता गया—दाने, तिल, कीड़े… जो भी मिल रहा था, वह खाता जा रहा था।
चलते-चलते मुर्गा इतना खो गया कि उसे पता ही नहीं चला कब वह खेत छोड़कर घने जंगल में जा पहुँचा।
जब उसने चारों ओर नज़र घुमाई—
सन्नाटा।
पेड़ों की सरसराहट।
और कोई भी अपना नहीं।
मुर्गा डरकर बोला,
“अरे बाप रे! मैं तो बहुत दूर निकल आया! अब क्या करूँ? वापस जाने का रास्ता भी याद नहीं…”
तभी झाड़ियों के पीछे से किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।
चर्र… चर्र…
मुर्गे का दिल तेज़ी से धड़कने लगा।
जैसे ही मुर्गे ने आवाज़ की दिशा में देखा—एक लोमड़ा उसकी तरफ बढ़ रहा था।
लोमड़े की आँखों में चमक…
चेहरे पर मुस्कान…
और मन में खतरनाक इरादा।
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मुर्गा कांपते हुए बोला,
“या अल्लाह! यह तो लोमड़ा है! अगर मैं यहीं खड़ा रहा, तो आज मेरा काम तमाम!”
उसी समय मुर्गे की नज़र दूर एक ऊँची दीवार पर पड़ी।
वह तेजी से उड़कर दीवार पर जा बैठा—हांफता हुआ, डरा हुआ, लेकिन सुरक्षित।
लोमड़ा दीवार के नीचे आकर बोला—
“सलाम अलैकुम मेरे प्यारे दोस्त!
अल्लाह करे तुम शांति से रहो।
क्या तुम मुझे नहीं पहचानते?
अरे हम तो पुराने दोस्त हैं!”
मुर्गा चुपचाप दूसरी तरफ देखने लगा।
लोमड़े ने फिर मुस्कुराते हुए कहा—
“क्या तुम्हें मेरे सलाम का भी जवाब नहीं देना?
हमने पहले भी दोस्ती की बातें की थीं, याद है?”
मुर्गा चुप।
पूरी तरह चुप।
लोमड़ा अंदर ही अंदर कुंठित होकर बोला—
“अरे भाई, सुनो तो… अभी-अभी शेर और चील ने जंगल में शांति का कानून लागू किया है। अब कोई किसी को नुकसान नहीं पहुंचाएगा। मैं शेर का दूत हूँ और तुम्हें बुलाने आया हूँ। नीचे आओ, डर कैसा?”
मुर्गा मन ही मन हँसते हुए बोला,
“वाह रे लोमड़े भाई… क्या गज़ब का झूठ बोलता है।”
पर बाहर से चुपचाप बैठा रहा।
लोमड़ा बार-बार बोला—
“नीचे आओ न!
मैं सच कह रहा हूँ!”
“क्या तुम मुझे दूत के रूप में कोई इज़्ज़त नहीं दोगे?”
“कम से कम एक शब्द तो बोलो!”
अंततः मुर्गा धीरे से बोला—
“लोमड़े भाई, मैं आपकी बात मानता हूँ। शांति की पहल अच्छी है।
लेकिन… मुझे ऐसा लगता है कि हालात बदलने वाले हैं।”
लोमड़ा चौंककर बोला—
“क्या मतलब? कौन-सा बदलाव?”
मुर्गा नीचे झांककर बोला—
“नीचे धूल का बादल उड़ रहा है…
और ऊपर चीलें गोले में उड़ रही हैं।
लगता है कुछ बड़ा आ रहा है।”
लोमड़े ने घबराकर पूछा—
“क्या देख पा रहे हो कि धूल किसकी है?”
मुर्गा आँखें सिकोड़कर बोला—
“अभी साफ नहीं… लेकिन ऐसा लग रहा है कि… शायद कोई बड़ा ग्रेहाउंड कुत्ता हो।”
ग्रेहाउंड का नाम सुनते ही लोमड़ा सिहर उठा।
उसके कान खड़े हुए।
पूँछ नीचे हो गई।
और चेहरे की सारी चालाकी गायब।
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वह हकलाकर बोला—
“भ… भाई… वह… ग्रेहाउंड?
मुझे तो जाना चाहिए! मैं बाद में मिलता हूँ!”
और बिना एक सेकंड गँवाए, जंगल की तरफ भाग गया।
मुर्गा हँसते हुए बोला—
“अरे! तुम क्यों भाग रहे हो?
तुम तो कहते थे कि अब जंगल में शांति है!
जो किसी को नुकसान पहुँचाएगा उसे सजा मिलेगी!”
भागता हुआ लोमड़ा चीखकर बोला—
“हाँ, लेकिन उस समय यह ग्रेहाउंड इधर नहीं था!
उसे यह शांति का कानून नहीं पता होगा!”
और पल भर में गायब।
लोमड़े के भागते ही मुर्गा दीवार से उतरा।
उसने राहत की गहरी सांस ली।
आसमान की ओर देखते हुए बोला—
“या अल्लाह, तेरी मेहरबानी!
तूने मुझे अपनी अक्ल का सही इस्तेमाल करने का मौका दिया।
तू ही मेरा रखवाला है।”
फिर वह धीरे-धीरे गाँव की ओर चलता हुआ बोला—
“लोमड़े की बातें मीठी जरूर थीं, पर उसके इरादे काले थे।
अक्ल और संयम ही आदमी को मुसीबत से बचाते हैं।”
और वह सुरक्षित अपने शेख के घर लौट आया।
शिक्षा:
चालाक लोगों की मीठी बातें हमेशा सच नहीं होतीं। संकट के समय समझदारी, धैर्य और सतर्कता ही सबसे बड़ी ढाल है।




