भेड़िये को चालाकी पड़ी महंगी | Moral Stories in Hindi
दोपहर का समय था। हल्की-हल्की धूप आँगन में ऐसे बिखरी थी, जैसे सुनहरी चादर धरती पर बिछ गई हो। हवा में ताजे पकवानों की खुशबू थी, और चिड़ियों की चहचहाहट माहौल को और भी सुहावना बना रही थी।
घर के अंदर, सेविका छोटे से बच्चे को गोद में लिए बैठी थी। वह उसे प्यार से खाना खिला रही थी—“ले बेटा, एक निवाला और… बस आखिरी चम्मच!”
बच्चा पहले तो बड़े मजे से खा रहा था, लेकिन जैसे ही पेट भर गया, उसने मुँह फेर लिया।
सेविका ने हँसते हुए कहा, “अरे, बस इतना ही? अब सो जा, लल्ला। देख, धूप भी कितनी प्यारी है, नींद आ जाएगी।”
लेकिन बच्चे को कहाँ नींद आने वाली थी! उसने होंठ सिकोड़ लिए और ज़ोर-ज़ोर से रोना शुरू कर दिया।
“अरे, चुप हो जा ना प्यारे! क्या हुआ मेरे लाल?” सेविका ने उसे झुलाते हुए कहा।
“नहींईई!” बच्चा और ज़ोर से चिल्लाया।
“लो, ये लोरी सुनो—चंदा मामा दूर के…”
लेकिन हर लोरी, हर पुचकार का नतीजा उल्टा हो रहा था। बच्चे का रोना और बढ़ता जा रहा था।
भेड़िये को चालाकी पड़ी महंगी
धीरे-धीरे सेविका का धैर्य जवाब देने लगा। पहले उसने गहरी साँस ली, फिर आँखें तरेरीं और बोली,
“अब अगर तू चुप नहीं हुआ ना, तो तुझे भेड़िये के सामने फेंक दूँगी!”
ये बात उसने गुस्से में कह तो दी, पर उसे क्या पता था कि बाहर कोई ये सब सुन भी रहा है!
घर के बाहर, झाड़ियों के पीछे, एक भेड़िया भूखा-प्यासा घूम रहा था। सुबह से उसे कुछ खाने को नहीं मिला था।
उसी वक्त उसने अंदर से ये आवाज़ सुनी—
“चुप हो जा वरना तुझे भेड़िये के सामने फेंक दूँगी!”
भेड़िये के कान खड़े हो गए।
वह मन ही मन मुस्कराया, “अरे वाह! आज तो भाग्य खुल गया! बिना शिकार किए ही खाना मिल जाएगा! बस थोड़ी देर रुक जाता हूँ… जैसे ही बच्चा बाहर फेंका जाएगा, मज़े से खा जाऊँगा।”
वह दबे पाँव खिड़की के नीचे आकर बैठ गया। आँखें चमक रहीं थीं और मुँह से लार टपक रही थी।
उधर अंदर बच्चे ने जब ये सुना कि भेड़िये के सामने फेंक दूँगी, तो वह सहम गया।
उसने रोना तुरंत बंद कर दिया। डर के मारे आँखें बड़ी-बड़ी कर लीं और सेविका के सीने से लिपट गया।
भेड़िये को चालाकी पड़ी महंगी
सेविका ने राहत की साँस ली—“वाह, आखिर मान ही गया! देखो, मेरे लाल तो कितना समझदार है।”
वह मुस्कराते हुए बोली, “अब ऐसे ही सो जा, नहीं तो सच में भेड़िया आ जाएगा।”
अब घर में सन्नाटा फैल गया।
बाहर भेड़िया बेचैन होने लगा।
“ये क्या! ये रो क्यों नहीं रहा? अरे, बच्चा रोएगा तो ही तो सेविका उसे बाहर फेंकेगी! ये चुप क्यों है?”
वह बार-बार कान लगाकर सुनता, पर कोई आवाज़ नहीं आती।
“कहीं सेविका अपना मन तो नहीं बदल गई? या शायद बच्चा पहले ही खा लिया गया?”
भेड़िये के मन में तरह-तरह के विचार आने लगे।
आख़िर उसने सोचा, “देखता हूँ ज़रा अंदर क्या चल रहा है।”
धीरे से वह खिड़की के पास आया और गर्दन ऊँची कर के झाँकने लगा।
बस, उसी वक्त सेविका की नज़र उस पर पड़ी।
“अरे! ये क्या! सच में भेड़िया!”
भेड़िये को चालाकी पड़ी महंगी
उसका चेहरा पीला पड़ गया।
उसने झट से खिड़की बंद की और ज़ोर से चिल्लाने लगी,
“बचाओ! बचाओ! भेड़िया… भेड़िया घर के बाहर है!”
घर के लोग दौड़ पड़े, पड़ोसी भी लाठी और डंडे लेकर आ गए।
चारों ओर हल्ला मच गया।
भेड़िये के तो होश उड़ गए।
“अरे बाप रे! ये क्या हो गया! मैं तो सिर्फ इंतज़ार कर रहा था, अब अपनी जान ले बैठूँगा क्या?”
वह डर के मारे जंगल की ओर भागा और भागते हुए सोचता गया,
“आज तो बड़ी गलती हो गई! व्यर्थ की उम्मीद में अपनी जान जोखिम में डाल दी!”
उस दिन के बाद भेड़िया कभी उस बस्ती के पास नहीं आया।
और सेविका ने भी कसम खाई कि अब किसी बच्चे को डराने के लिए ‘भेड़िया’ शब्द कभी नहीं बोलेगी।
क्योंकि भले ही भेड़िया बाहर से चला गया था, पर उस दिन के बाद बच्चा रात में तकिए से चिपक कर ही सोता था।
शिक्षा:
डर या धोखे में कही गई बात भी कभी-कभी अनचाहा परिणाम ला सकती है, इसलिए शब्द सोच-समझकर बोलने चाहिए।




