सावधान मेमना | Moral Stories in Hindi
हरी-भरी पहाड़ियों से घिरा एक सुंदर-सा जंगल था।
जंगल में हवा सीटी बजाती थी, पत्तियाँ गुनगुनाती थीं, और नाले में पानी झिलमिल करता था।
उसी जंगल के किनारे एक छोटी-सी झोपड़ी में रहती थी एक बकरी और उसका प्यारा-सा बच्चा — मेमना।
माँ-बेटे की जोड़ी बहुत प्यारी थी।
बकरी हर सुबह जंगल में घास चरने जाती और मेमना झोपड़ी के आँगन में खेलता — कभी तितलियों के पीछे भागता, कभी अपनी छोटी-सी पूँछ घुमाकर खुश होता।
एक दिन बकरी तैयार हो रही थी। उसने टोकरी उठाई, अपने बच्चे के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और कहा —
“बेटा, मैं जंगल में घास लेने जा रही हूँ। तू घर में ही रहना।”
मेमना मासूमियत से बोला,
“माँ, मैं अकेला रह जाऊँगा न?”
बकरी मुस्कराई —
“डरना नहीं मेरे लाल। बस याद रखना — दरवाज़ा अच्छे से बंद कर लेना, और कोई भी आए, तो दरवाज़ा मत खोलना। समझे?”
“अगर कोई कहे कि वो तुम्हारी माँ है, तो पहले उसकी आवाज़ ध्यान से सुनना, और खिड़की से झाँककर देखना भी। जंगल में कई चालाक जानवर घूमते रहते हैं।”
मेमना ने सिर हिलाया,
“ठीक है माँ, मैं बहुत समझदार बनूँगा।”
सावधान मेमना
बकरी ने मुस्कराकर कहा,
“वाह मेरे शेर! यही तो मैं चाहती हूँ।”
और फिर वो पहाड़ी की ओर चल दी — ठक-ठक उसके खुरों की आवाज़ जंगल में गूँजती रही।
लेकिन झाड़ियों के पीछे, कुछ दूरी पर एक चालाक सियार घात लगाए बैठा था।
उसकी आँखें लाल चमक रही थीं और जीभ मुँह से बाहर निकली हुई थी।
उसने बकरी को जाते हुए देखा और बुदबुदाया —
“हूँह! ये तो बढ़िया मौका है। झोपड़ी में अब सिर्फ छोटा मेमना है। अगर मैं उसे पकड़ लूँ, तो आज तो दावत ही दावत!”
उसने बकरी की आवाज़ की नकल करने की ठानी।
सियार बहुत चालाक था, उसने कई बार बकरी को ‘में-में’ करते सुना था, तो वो बोला —
“में—में—मेमने बेटा, दरवाज़ा खोलो, मैं तुम्हारी माँ हूँ!”
उसकी आवाज़ थोड़ी कर्कश थी, पर उसने अपनी पूरी कोशिश की कि वो मुलायम लगे।
मेमना उस समय झोपड़ी में बैठा अपने लकड़ी के खिलौनों से खेल रहा था।
जैसे ही उसने बाहर से ‘में—में’ की आवाज़ सुनी, वह चौंक गया।
सावधान मेमना
“माँ इतनी जल्दी लौट आईं? अभी तो सूरज भी ऊपर नहीं गया…”
उसे माँ की बात याद आई — ‘पहले खिड़की से झाँककर देखना।’
धीरे-धीरे वह खिड़की की ओर गया और झिर्री से झाँककर देखा।
और वहाँ क्या दिखा?
एक सियार, जिसकी आँखों में भूख और मुँह से लार टपक रही थी!
मेमने की तो आँखें फैल गईं, पर डरने के बजाय उसने दिमाग चलाया।
वो खुद मुस्कराया —
“अच्छा! तो ये मेरी माँ बन रहा है?”
मेमना खिड़की के पास खड़ा हुआ और अपनी प्यारी-सी आवाज़ में बोला —
“रुको माँ! मैं दरवाज़ा खोलती हूँ…”
सियार की आँखें चमक उठीं —
“बस! अब तो पकड़ा गया यह नन्हा मूर्ख,” उसने सोचा।
सावधान मेमना
पर तभी झोपड़ी के अंदर से वही आवाज़ फिर आई —
लेकिन इस बार ज़रा अलग अंदाज़ में!
मेमना ज़ोर से बोला —
“भाग जा, ओ चालाक सियार! मैं तेरी आवाज़ पहचान गई हूँ। तू मेरी माँ नहीं, एक धूर्त शिकारी है!”
सियार बुरी तरह हक्का-बक्का रह गया।
“अरे! ये कैसे हो सकता है? अभी तो मैंने उसकी माँ को जंगल में जाते देखा था, फिर ये अंदर कौन?”
वह चारों ओर देखने लगा, डर गया, और सोचने लगा —
“कहीं बकरी वापस आ गई क्या? अगर उसने मुझे देख लिया तो वो अपने नुकीले सींगों से मुझे हवा में उछाल देगी!”
डर से उसके पैरों में काँपने लगी और वह धप्प-धप्प करता हुआ भाग निकला।
थोड़ी देर बाद बकरी वापस आई।
वो टोकरी में हरी-हरी घास लेकर आई थी।
जैसे ही उसने झोपड़ी का दरवाज़ा खोला, मेमना भागकर उसके गले लग गया।
सावधान मेमना
“माँ! माँ! एक सियार आया था। वो तुम्हारी आवाज़ में मुझे बुला रहा था।”
बकरी ने चौककर कहा, “क्या? फिर तूने क्या किया?”
मेमना गर्व से बोला,
“मैंने तुम्हारी बात याद रखी, माँ! मैंने खिड़की से झाँका, उसे देखा और उसे डाँटकर भगा दिया!”
बकरी ने अपने छोटे से बेटे को सीने से लगा लिया।
उसकी आँखों में गर्व और खुशी चमक रही थी।
“वाह मेरे लाल! आज तूने सच्चे मायने में समझदारी और हिम्मत दिखाई है। अगर हर बच्चा ऐसे ही सावधानी रखे, तो कोई भी चालाकी कभी सफल न हो।”
मेमना मुस्कराया और बोला,
“अब मैं भी जंगल में सबसे समझदार मेमना हूँ!”
शिक्षा:
सावधानी और समझदारी से ही हम मुश्किलों से बच सकते हैं। माता-पिता की सलाह मानना हमेशा हमारे भले के लिए होता है।




