🐭 गाँव का चूहा और शहर का चूहा | Country Mouse & City Mouse 🏡

नैतिक कहानियाँ | Top Moral Stories in Hindi | गाँव का चूहा और शहर का चूहा

बहुत, बहुत समय पहले की बात है।
एक विशाल पेड़ की जड़ों के नीचे मिट्टी का एक छोटा-सा बिल था।
वहीं रहता था — गाँव का चूहा।
वह सादा जीवन जीता था, मिट्टी की खुशबू में साँस लेता था, खेतों की हरियाली उसकी आँखों को भाती थी।
उसका घर भले ही छोटा था, लेकिन दिल बहुत बड़ा था।

उसी का एक घनिष्ठ मित्र था — शहर का चूहा।
वह चमक-दमक और शानो-शौकत की दुनिया में रहता था।
बड़े-बड़े घरों में चुपके-चुपके घूमता, और तरह-तरह के स्वादिष्ट खाने का मज़ा लेता।

दोनों की दोस्ती बहुत पुरानी थी —
एक मिट्टी और सादगी का प्रतीक, दूसरा ऐश और चमक का।
फिर भी दोनों एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे।

एक दिन गाँव का चूहा खेतों में टहलते हुए सोचने लगा,
“कितना अच्छा होता अगर मेरा शहर वाला मित्र भी यहाँ आता।
उसे दिखाता कि सच्ची खुशी तो इसी सादगी में है।”

वह बैठा और अपने नन्हे पंजों से पत्र लिखा —

गाँव का चूहा और शहर का चूहा

“प्रिय मित्र,
कभी हमारे गाँव भी पधारो।
यहाँ की ठंडी हवा, हरे खेत और दिल से मिलने वाले लोग तुम्हें ज़रूर पसंद आएँगे।”

शहर का चूहा मुस्कराया और बोला,
“वाह! मज़ेदार! चलो, इस देहाती जीवन का स्वाद भी चख लिया जाए।”

कुछ ही दिनों में वह अपने चमकदार बाल सँवारकर, पनीर की गंध सूँघते-सूँघते गाँव की ओर निकल पड़ा।

गाँव का चूहा उसे देखकर झूम उठा —
“अरे मेरे प्यारे मित्र! तुम्हें देखकर तो मन खिल गया।
चलो, आराम करो, फिर साथ खाना खाएँगे।”

गाँव का चूहा जितनी मेहनत कर सकता था, उसने सब किया।
उसने खेतों से ताज़े मटर के दाने, थोड़ा पनीर, कुछ अनाज और सूखे फल जुटाए।
छोटे से पत्तों के बर्तन में सजाया और बोला,
“लो मित्र, यही मेरा छोटा-सा भोज है। मन से बनाया है।”

शहर का चूहा पहले तो थोड़ा मुस्कराया, फिर व्यंग्य से बोला,
“अरे! ये भी कोई खाना हुआ?
हमारे शहर में तो ऐसे खाने को चूहे भी ना सूँघें!
न मख्खन, न मिठाई, न कोई स्वाद!”

गाँव का चूहा शांत मुस्कान के साथ बोला,
“मित्र, यह भले साधारण है, पर पेट भर देता है और मन को शांति देता है।”

शहर का चूहा हँसते हुए बोला,
“शांति और सादगी से क्या होगा?
ज़रा मेरे साथ चलो, मैं तुम्हें दिखाता हूँ — असली ज़िंदगी कैसी होती है!”

गाँव का चूहा और शहर का चूहा

गाँव का चूहा सोच में पड़ गया —
“कभी देखा नहीं शहर, चलो अनुभव कर लेते हैं।”

रात के अँधेरे में दोनों निकल पड़े।
रास्ते में खेत, नदियाँ, और फिर ऊँचे-ऊँचे मकान दिखाई देने लगे।
जैसे-जैसे वे शहर के करीब पहुँचे, रोशनी बढ़ती गई —
सड़कें चमक रही थीं, हवा में तरह-तरह की गंधें, गाड़ियों का शोर, और इंसानों की भीड़।

गाँव का चूहा दंग रह गया।
“वाह! यह तो सच में दूसरी दुनिया है!”

शहर का चूहा गर्व से बोला,
“चलो मेरे घर, मैं तुम्हें राजा की तरह खिलाता हूँ।”

शहर का चूहा उसे एक बड़े घर में ले गया,
जहाँ रसोई में मिठाइयाँ, पनीर, केक और मेवे रखे थे।

“देखो मित्र,” उसने कहा,
“यहाँ रोज़ ऐसा ही भोज होता है। अब तो मानोगे न कि शहर की ज़िंदगी सबसे बढ़िया है?”

गाँव का चूहा और शहर का चूहा

दोनों ने दावत शुरू की —
सुगंध से कमरा भर गया, गाँव का चूहा तो आनंद से बोला,
“अरे! ये तो स्वर्ग है!”

लेकिन तभी — धड़ाम!
दरवाज़ा खुला।

दो इंसान अंदर घुसे और बोले,
“लगता है चूहे फिर आ गए!”

दोनों चूहे घबरा गए।
तेज़ कदमों की आवाज़ सुनते ही वे भागकर सोफ़े के नीचे छिप गए।
दिल की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि खुद को सुनाई दे रही थीं।

जब लगा कि खतरा टल गया है, वे बाहर निकले —
पर तभी भौं-भौं-भौं!
दो बड़े कुत्ते कमरे में आ गए।

अब तो हालत और ख़राब —
दोनों जान बचाकर इधर-उधर भागे, किसी तरह एक कोने में छिपे और घंटों तक हिलने की हिम्मत नहीं हुई।

गाँव का चूहा और शहर का चूहा

काँपते हुए गाँव के चूहे ने कहा,
“मित्र… तुम्हारी ज़िंदगी में ऐश तो बहुत है, पर चैन कहाँ है?
यहाँ हर पल डर है, हर कोने में खतरा!”

वह गहरी साँस लेकर बोला,
“मुझे अपनी सूखी रोटी और शांति चाहिए,
न कि यह मिठाई और डर।”

शहर का चूहा कुछ पल चुप रहा।
वह समझ गया — गाँव का मित्र जो कह रहा है, वही सच्चाई है।

गाँव का चूहा मुस्कराकर बोला,
“भले ही मेरे पास थोड़ा है,
पर मैं हर कौर सुकून से खाता हूँ।”

और वह बिना पीछे देखे, अपने गाँव लौट गया —
जहाँ उसे कोई डर नहीं, बस मिट्टी की खुशबू, चाँदनी रात और दिल की शांति मिली।

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