मोर पंख वाली कहानी | Motivational Story in Hindi
बरसात का मौसम था — आसमान में घने, काले बादल उमड़-घुमड़ रहे थे, हवा में मिट्टी की सोंधी खुशबू फैली थी, और पेड़ों की पत्तियाँ बारिश की बूंदों से चमक रही थीं। जंगल का हर कोना जैसे ताजगी से भर गया था। तालाबों में पानी लबालब था, और मोर अपने रंग-बिरंगे पंख फैलाकर नाच रहे थे। उनकी थिरकती चाल, खुलते पंखों की झिलमिलाहट और “केँहू-केँहू” की गूंज से पूरा जंगल जीवंत हो उठा था।
उसी समय, पास के एक बड़े पीपल के पेड़ की ऊँची डाल पर एक नीलकंठ बैठा था। वह उन नाचते मोरों को बड़ी उत्सुकता से देख रहा था। नीले, हरे और सुनहरे रंगों की चमक उसके मन में एक अजीब सी हलचल पैदा कर रही थी। वह सोचने लगा, “वाह! मोरों की क्या बात है! सबकी नज़र इन पर ही टिक जाती है। अगर मेरे पास भी ऐसे पंख होते, तो मैं भी जंगल का सबसे सुंदर पक्षी होता।”
बारिश कुछ देर में थम गई। नीलकंठ का मन अब किसी और चीज़ पर नहीं लग रहा था। वह उड़ता हुआ मोरों के रहने की जगह पर पहुँच गया। वहाँ उसने देखा कि ज़मीन पर कई जगह मोरों के टूटे हुए पंख पड़े थे — नीले, सुनहरे, हरे और बैंगनी रंगों के। धूप में वे ऐसे चमक रहे थे जैसे ज़मीन पर किसी ने रंगीन कांच बिखेर दिए हों।
मोर पंख वाली कहानी
नीलकंठ की आँखें खुशी से चमक उठीं। “अगर मैं ये पंख अपनी पूंछ में लगा लूँ तो? हाँ! तब तो मैं भी मोर जैसा दिखूँगा!” उसने मन में सोचा और बिना देर किए पंख उठाकर अपनी पूंछ में बाँध लिए।
अब वह उत्सुकता से तालाब के किनारे गया और पानी में झाँका। उसका प्रतिबिंब पानी में लहरा रहा था — पूंछ में मोर के रंगीन पंख चमक रहे थे। वह फूला नहीं समाया।
“वाह! अब मैं भी मोर बन गया हूँ!” उसने गर्व से कहा।
उत्साहित होकर वह नाचते हुए मोरों के झुंड की ओर बढ़ा। ठुमकते हुए वह बोला, “देखो, अब मैं भी तुम्हारी तरह सुंदर हूँ!”
मोरों ने उसे देखा — और फिर एक-दूसरे की ओर देखकर ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे।
“अरे! ये तो हमारा नकली रूप बना कर आया है!” एक मोर बोला।
“हा हा हा! देखो, इसकी चाल तो देखो, बिल्कुल अटपटी!” दूसरे ने चिढ़ाया।
कुछ ही देर में मोरों ने उस पर हमला कर दिया। वे उसकी नकली पूंछ पर टूट पड़े और अपनी नुकीली चोंचों से सारे पंख नोच डाले। बेचारा नीलकंठ दर्द से चिल्लाता रहा, लेकिन कोई दया नहीं दिखा।
मोर पंख वाली कहानी
आख़िरकार वह घायल और शर्मिंदा होकर वहाँ से उड़ गया। जैसे-तैसे अपने साथियों के पास पहुँचा, तो वहाँ भी किसी ने उसे अपनाया नहीं।
एक नीलकंठ ने गुस्से में कहा, “तुमने अपनी पहचान छोड़ दी, सिर्फ दूसरों जैसा दिखने के लिए। याद रखो, सुंदरता सिर्फ रूप में नहीं, गुणों और स्वभाव में होती है। मोर मोर इसलिए नहीं है कि उसके पास रंगीन पंख हैं, बल्कि इसलिए कि उसकी चाल, उसका नाच और उसका आत्मविश्वास उसे खास बनाते हैं।”
नीलकंठ की आँखें झुक गईं। उसे अपनी गलती का एहसास हो गया था। उसने मन ही मन ठान लिया — “अब मैं कभी किसी की नकल नहीं करूँगा। मैं जैसा हूँ, वैसा ही रहूँगा — अपनी पहचान पर गर्व के साथ।”
उस दिन के बाद, वह हर सुबह अपनी सच्ची नीली चमक में उड़ता था — अब उसे किसी और की तरह बनने की चाह नहीं थी।
शिक्षा:
लालच हमेशा हानि का कारण बनता है। जो हमारे पास है, उसी में संतोष करना ही सच्ची बुद्धिमानी है।




