किसान और साँप की कहानी | Motivational Story in Hindi
बहुत समय पहले की बात है। एक शांत-सा गाँव था जहाँ की मिट्टी उपजाऊ और लोग मेहनती थे। उसी गाँव में रहने वाला एक किसान था — ईमानदार, मेहनती और परिवार के लिए समर्पित। उसकी दुनिया बस उसके खेत और उसका परिवार ही था। उसके पास एक इकलौता बेटा था, जिसका वह पूरा ध्यान रखता और उसे हर संभव सीख देता।
एक गर्म दोपहर की बात है। सूरज तीखा था, हवा सुस्त चल रही थी और खेतों में सूखी घास की टहनियाँ हर जगह बिखरी पड़ी थीं। किसान अपने बेटे के साथ खेत में निराई-गुड़ाई कर रहा था। बेटा हल्की-फुल्की हरकतों में मस्त था — कभी खिलखिलाकर हँसता, कभी मिट्टी में कीड़े ढूँढता। पिता प्यार से उसे निर्देश देता, “धीरे-धीरे पैर रखना, ध्यान से काम करना, जहां घास ज्यादा हो वहां संभलकर जाना।”
पर बच्चे की आँखों में खेल की चमक थी और सावधानी थोड़ी कम। जैसे ही वह एक सूखी घास के ढेर के पास गया, उसका पैर अचानक कुछ पर पड़ गया। वह कुछ बोलने ही वाला था कि एक तेज फुफकार आई — साँप था। वह विषैला साँप अपनी पूँछ फैला कर वहीं शांत बैठा था। बच्चे ने अनजाने में उसकी पूँछ पर पैर रख दिया और साँप क्रोध में तमतमाया। वह फुर्ती से आँखें चमकाकर झपट्टा मारा और लड़के को काट लिया।
एक पल के भीतर ही विष फैलने लगा। लड़का चरहरा कर गिर पड़ा। किसान दौड़ा, बेहोश बेटे को गोद में उठाया और चीख-चीखकर मदद दिखाने लगा, पर ज़हर तेज़ी से काम कर रहा था। दर्द, डर और बेबसी — सब कुछ एक साथ किसान के अंदर उमड़ आया। उसके आँसू रुक ही नहीं रहे थे। वह भूला नहीं था कि अब उसका पूरा संसार, उसका इकलौता बेटा, उसके हाथ से खिसक गया था।
शोक के साथ-साथ गुस्से ने भी उसे घेर लिया। उसने पास ही रखी कुल्हाड़ी उठाई और साँप को ढूँढ निकाला। आँखों में आग लिए उसने साँप पर वार किया — कुल्हाड़ी का तेज प्रहार पड़ा और साँप की पूँछ कटकर अलग हो गई। साँप दर्द से कराह उठा और बिल की ओर खिसक गया — उसकी धड़कन में भी अब प्रतिशोध की लपट जाग रही थी।
कुछ दिनों बाद, वह साँप घावों और क्रोध से भरकर किसान के घर की ओर लौटा। निशब्द लेकिन खतरनाक चुप्पी के साथ वह गौशाला गया और वहाँ के मवेशियों पर हमला कर दिया। उसने कई पशुओं को डस लिया; ज़हर धीरे-धीरे फैल गया और एक-एक करके वे मरने लगे। किसान जो पहले ही बेटा खोकर टूट चुका था, अब अपनी आजीविका का भी सहारा खोता देख हिल गया। उसका दर्द दुगना हो गया — एक मार ताबूत में और दूसरी मार उस आर्थिक संकट की जो सामने आ गया था।
किसान और साँप की कहानी
रातें किसान के लिए बेघर सपनों से भरी हुई थीं — बार-बार वह बेटे की स्मृति में जागता, फिर अपने हाथ पर देखता कि कैसे उसने जीवन के लिए मशाल की तरह लड़ते हुए खुद अपने हाथों से कुछ कर डाला था। लेकिन एक बात बार-बार उसे तंग करती — यह बैर किस तरह आगे बढ़ रहा है और किस तरह अंतहीन क्षति दे रहा है। उसने सोचा, “हमारी नाराज़गी ने हमें क्या दिया? हमने क्या पाया? अब और नुकसान सहना ठीक नहीं।”
अगले दिन किसान एक शांत मन से घर से बाहर निकला। उसने एक कटोरा पानी और दूध भरा — दूध उसने सोच-समझकर चुना, क्योंकि दूध में नम्रता और शांति का प्रतीक समझा जाता था। वह साँप के बिल के पास गया, कटोरा जमीन पर रखकर मधुर स्वर में बोला, “साँप भाई, हम दोनों का बहुत बड़ा नुकसान हुआ है। तुमने मेरे बेटे को छीन लिया, और मैंने तुम्हारी पूँछ काटी। इस घृणा से और नुकसान हो रहा है। आओ, इस बैर को यहीं खत्म कर दें — नफ़रत से किसी का भला नहीं, न हमें सुकून।”
कटोरे पर से हल्की बूँदें टपक रहीं थीं और पेड़ों की पत्तियाँ सरसराहट कर रही थीं। बिल के भीतर से ठंडी, धीमी आवाज़ निकली — साँप ने धीरे से कहा, “किसान, मैं तेरा आभार समझता हूँ, पर मेरी पूँछ कटने की पीड़ा और तेरे बेटे की मौत — ये दोनों ही गहरे जख्म हैं। तुमने जो किया, मैंने जो किया — दोनों का असर बहुत बड़ा है। दोस्ती की गुंजाइश शायद अब नहीं रही। कुछ घाव ऐसे होते हैं जो भरते नहीं।”
किसान कटोरा उठाकर रोज़मर्रा की तरह वापस आया। उसके कदम धीमे थे, आँखों में एक भारी ठहराव था। वह समझ गया कि हर रिश्ते का मरहम हर बार संभव नहीं होता। कुछ चोटें इतनी गहरी होती हैं कि जोड़ा नहीं जा सकता। उसने यह भी समझा कि कभी-कभी माफ़ी की कोशिश भी असफल हो सकती है — और यह सच उसे भीतर तक झकझोर गया।
किसान और साँप की कहानी
दिनों-हफ्तों बाद भी गाँव वाले इस घटना की चर्चा करते रहे — कुछ कहते, “किसान ने सही किया कि माफ़ी की पेशकश की,” तो कुछ कहते, “कुछ चोटें दफन हो जाती हैं, पर जख्म रह जाते हैं।” किसान का जीवन फिर कभी पहले जैसा नहीं रहा। उसने हर सुबह खेत में काम किया, पर मन के उस हिस्से में खालीपन हमेशा बना रहा। उसने अपने भीतर यह सत्य स्वीकार कर लिया कि उसके क्रोध और साँप के बदले में हुई हिंसा ने न केवल उसे तकलीफ़ दी, बल्कि उसके जीवन की रूपरेखा ही बदल दी।
समय के साथ किसान ने यह भी जाना कि कुछ रिश्ते जो एक बार टूट जाते हैं, वे चाहे कितनी भी कोशिश से ठीक करने की कोशिश कर लो, वापस पहले जैसी गरिमा और विश्वास नहीं ला पाते। उसने फिर से सोचा, “मेरे ग़ुस्से ने मुझे क्या दिया? बदला लेने से मुझे क्या मिला? बस गहरी चोटें और एक सदी की थकावट।” वह समझ गया कि सही राह अक्सर नम्रता और समझ की होती है, पर कभी-कभी समझ से भी चीज़ें वापस नहीं आतीं — और उसे यह स्वीकार करना पड़ा।
किसान ने अंततः अपने जीवन का मार्ग बदल लिया — उसने गहरे दुःख के बीच भी धैर्य रखा, अन्न उगाया, और गाँव वालों की मदद करने लगा। पर उस दिन उसने जो दूध साँप के बिल पर रखा था, वह उसके दिल की एक याद बन गया — एक कोशिश, जो असफल रही, पर जिसने उसे यह सिखाया कि कभी-कभी इंसान की सीमा होती है, और हर घाव भरता नहीं। उसने यह भी मान लिया कि माफ़ी की इच्छा बहुमूल्य है, भले ही उसे स्वीकार न किया जाए।
कई सालों तक जब भी गाँव में कोई घटना होती, बुज़ुर्ग किसान की वह कहानी सुनाई जाती — कि कैसे गुस्सा और प्रतिशोध दोनों को बार-बार भारी कीमत चुकानी पड़ती है; और कैसे कुछ चोटें इतनी गहरी होती हैं कि उनका इलाज असंभव नज़र आता है।
किसान ने अपने जीवन के आख़िरी दिनों में यह सीख सबको दी — “लड़ाई से पहले सोचो, प्रतिशोध से पहले पिघलो; क्योंकि कुछ निशान ऐसे होते हैं, जो ज़िंदगी भर साथ रहते हैं।”
शिक्षा:
कुछ चोटें इतनी गहरी होती हैं कि माफ़ी भी उन जख्मों को भर नहीं पाती। प्रतिशोध और हिंसा दोनों ही अंततः नुकसान पहुँचाते हैं — कभी-कभी ऐसा नुकसान जिसे कोई मरहम नहीं मिटा पाता। नम्रता और समझ अच्छी बातें हैं, पर उनसे भी सब कुछ ठीक नहीं होता; इसलिए हिंसा और बदले से बचना ही बुद्धिमानी है।




