छोटे बच्चों की कहानी | Story for Kids in Hindi
बहुत समय पहले की बात है।
एक हरे-भरे खेतों से घिरे शांत और प्यारे गाँव में लोग बड़ी सादगी से रहते थे।
सुबह सूरज के साथ ही उनकी दिनचर्या शुरू होती —
कोई खेत जोतने निकलता, कोई कुएँ से पानी लाता,
और बच्चे गलियों में हँसी-ठिठोली करते घूमते रहते।
गाँव के किनारे, एक बड़े-से अस्तबल में कई घोड़े रहते थे —
चमकदार कोट वाले, मज़बूत टाँगों वाले, और काम के सच्चे साथी।
किसान उन्हीं पर अपने बोझ लादते, व्यापारी उन्हीं पर यात्राएँ करते,
और गाँव के बच्चे उन्हीं की पीठ पर बैठकर सपनों की सवारी करते।
अस्तबल की देखभाल करता था एक बुज़ुर्ग आदमी, जिसका नाम था गिरधारी।
उसका दिल उतना ही कोमल था जितना उसका स्वभाव।
हर सुबह वह घोड़ों को प्यार से पुकारता — “आओ मेरे वीरों, आज भी खेतों में दौड़ लगानी है!”
वह उन्हें ताज़ा चारा डालता,
साफ पानी देता,
और उनके गले पर हाथ फेरकर कहता — “तुम सब मेरे परिवार जैसे हो।”
घोड़े भी उसे उतना ही प्यार करते।
उनकी आँखों में चमक और गर्दन हिलाने की लय, मानो कृतज्ञता का गीत गा रही हो।
छोटे बच्चों की कहानी
उसी गाँव में एक कुत्ता भी रहता था —
भूरा, झबरीला, और हमेशा गुस्से से भरा हुआ।
उसे गाँव वाले “हठी कुत्ता” कहते थे, क्योंकि वह किसी की सुनता ही नहीं था।
बच्चे जब खेलते हुए गुज़रते, तो वह बिना वजह उन पर भौंकने लगता।
जो राहगीर उसे देखकर मुस्कुरा देता, वह दाँत दिखाकर गुर्राने लगता।
उसका बस एक ही नियम था — “मुझे किसी से मतलब नहीं, और कोई मुझसे मतलब न रखे।”
वह ना किसी से स्नेह चाहता था, ना किसी पर भरोसा।
वह मानता था कि “दुनिया स्वार्थी है, इसलिए मैं सबका दुश्मन ही सही।”
सूरज सिर पर था, गर्म हवाएँ ज़मीन को झुलसा रही थीं।
हर जीव अपने ठिकाने में आराम कर रहा था।
गिरधारी भी अस्तबल के दरवाज़े खुला छोड़कर अंदर के एक कोने में झपकी ले रहा था।
वहीं, इधर-उधर भटकता हुआ वह हठी कुत्ता अस्तबल के पास आ पहुँचा।
उसने दरवाज़ा खुला देखा और अंदर झाँका।
अंदर ठंडक थी, और हवा में ताज़ा घास की महक।
“वाह… क्या जगह है!” उसने सोचा।
“न धूप है, न शोर, न कोई परेशान करने वाला। यही तो आराम की जगह है।”
छोटे बच्चों की कहानी
वह धीरे-धीरे अंदर घुस गया, और जाकर एक बड़ी नांद पर चढ़ बैठा।
वही नांद, जिसमें घोड़ों के लिए ताज़ा हरा चारा रखा था।
चारे की नरमी उसे इतनी भा गई कि उसने वहीं लेटकर आँखें बंद कर लीं।
धीरे-धीरे उसे नींद आ गई…
और उसने ठान लिया — “अब यही मेरा ठिकाना होगा।”
शाम ढली।
घोड़े दिनभर के काम के बाद लौटे — पसीने से लथपथ, थके हुए, पर खुश कि अब उन्हें मिलेगा आराम और खाना।
पहला घोड़ा नांद के पास आया।
जैसे ही उसने सिर झुकाया, अचानक — “भौं! भौं! भौं!!”
कुत्ता उछलकर उठा और दाँत दिखाते हुए भौंकने लगा।
बेचारा घोड़ा डरकर पीछे हट गया।
दूसरा घोड़ा आगे बढ़ा — “शायद अब यह शांत हो गया हो,” उसने सोचा।
पर नहीं।
फिर वही हुआ — भौंकना, गुर्राना, झपटना।
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तीसरा घोड़ा, चौथा घोड़ा — सब कोशिश करते रहे,
लेकिन कोई भी एक निवाला चारा नहीं खा सका।
कुत्ता गर्व से फूला नहीं समा रहा था— “वाह! देखा मैंने सबको कैसे डरा दिया! अब ये कोई हिम्मत नहीं करेगा मेरे पास आने की।”
लेकिन सच्चाई यह थी कि वह न खुद चारा खा सकता था,
क्योंकि वह उसका भोजन था ही नहीं,
और न ही किसी और को खाने दे रहा था।
उसकी हठधर्मी ने सबको परेशान कर दिया था।
घोड़े एक कोने में खड़े थे — भूखे, थके और दुखी।
एक बूढ़ा घोड़ा बोला — “भाई, ये तो अजीब जीव है। खुद नहीं खाता, और हमें भी नहीं खाने देता।”
दूसरे ने कहा — “कभी-कभी शक्ति से नहीं, हठ से भी बड़ा नुकसान होता है।”
रात बीती…
घोड़े भूखे रहे, और कुत्ता भी, क्योंकि वह बस अपनी ज़िद में अड़ा था।
धीरे-धीरे वह खुद भी कमज़ोर पड़ने लगा।
छोटे बच्चों की कहानी
सुबह गिरधारी आया।
उसने दृश्य देखा तो हैरान रह गया।
घोड़े सुस्त, भूखे और थके हुए थे,
और वह कुत्ता नांद पर चिपका पड़ा था — आधा सोया, आधा बेदम।
गिरधारी ने गुस्से में चिल्लाया — “अरे ओ बदमाश! ये जगह तेरी नहीं है! तू यहाँ क्या कर रहा है?”
कुत्ता डरकर नीचे कूदा।
गिरधारी ने डंडा उठाया और बोला — “भाग जा यहाँ से! दूसरों का हक़ छीनने वाला कभी सुख नहीं पाता!”
कुत्ता पूँछ दबाकर भाग गया।
घोड़े राहत की साँस लेने लगे और फिर भूख मिटाने में जुट गए।
धीरे-धीरे गाँव में यह घटना चर्चा का विषय बन गई।
गिरधारी अक्सर बच्चों को यह कहानी सुनाते हुए कहते —
“बेटा, जो चीज़ तुम्हारी नहीं है, उस पर जबरदस्ती कब्ज़ा मत करो।
ऐसा करने से तुम दूसरों का तो नुकसान करते ही हो,
पर अंत में खुद को भी दुख और अपमान मिलता है।”
शिक्षा:
जो चीज़ तुम्हारी नहीं है, उस पर जबरदस्ती कब्ज़ा करना खुद के लिए भी नुकसानदायक होता है।




