लघु कथाएँ | Short Moral Story in Hindi
बहुत समय पहले की बात है — पहाड़ियों से घिरे एक छोटे से सुंदर गाँव में एक बहुत पुराना और विशाल पेड़ था। वह इतना ऊँचा था कि लगता था उसकी शाखाएँ बादलों से बातें कर रही हों। गाँव के लोग उसे “दयालुता का पेड़” कहते थे, क्योंकि जब भी कोई किसी की मदद करता या दयालुता दिखाता, उस पेड़ पर चमचमाते सुनहरे फल उग आते थे।
वह पेड़ पूरे गाँव का गर्व था। बच्चे उसके नीचे खेलते, बूढ़े उसकी छाँव में विश्राम करते और हर त्योहार पर लोग वहाँ दीप जलाकर आशीर्वाद माँगते। लेकिन एक दिन कुछ अजीब हुआ—पेड़ बिल्कुल सूना था। न कोई सुनहरा फल, न कोई चमक। उसकी शाखाएँ झुकी हुई थीं, मानो वह उदास हो।
उसी दिन, एक छोटा लड़का रवि, नदी से पानी भरने जा रहा था। उसने पेड़ को देखा और हैरानी से बोला, “अरे! इस पेड़ पर आज कोई फल क्यों नहीं हैं?”
वह भागकर गाँव की सबसे बुज़ुर्ग और समझदार महिला लीला अम्मा के पास पहुँचा।
रवि ने पूछा, “अम्मा, क्या दयालुता का पेड़ बीमार हो गया है?”
लीला अम्मा मुस्कराईं, पर उनकी आँखों में हल्की चिंता थी। उन्होंने धीरे से कहा, “नहीं बेटा, पेड़ बीमार नहीं हुआ है… हम हुए हैं। यह पेड़ हमारे दिलों का दर्पण है। जब गाँव वाले एक-दूसरे से प्यार, मदद और दया करना छोड़ देते हैं, तो यह पेड़ फल देना बंद कर देता है।”
Short Moral Story in Hindi
रवि ने गंभीरता से सिर झुका लिया। “अगर ऐसा है, अम्मा, तो मैं इस पेड़ को फिर से खुश करूँगा।”
उसने अगले ही दिन से शुरुआत की। सुबह जब वह स्कूल जा रहा था, तो उसने देखा कि उसकी पड़ोसी मीरा आंटी सब्ज़ियों की एक भारी टोकरी उठाने की कोशिश कर रही हैं। रवि दौड़कर बोला, “रुकिए आंटी, मैं आपकी मदद कर देता हूँ।” उसने टोकरी उठाकर उनके घर तक पहुँचाई।
मीरा आंटी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बेटा, तू तो बहुत मददगार है। भगवान तुझे खुश रखे।”
अगली सुबह रवि फिर पेड़ के पास गया। उसने देखा — पेड़ पर एक छोटी सी सुनहरी कली उग आई थी! उसकी आँखें चमक उठीं। “वाह! अम्मा सही कहती थीं — दया सचमुच जादू करती है!”
अब रवि ने रोज़ कोई न कोई अच्छा काम करने का निश्चय कर लिया।
कभी वह किसी खोए हुए यात्री को रास्ता दिखाता, कभी अपने दोस्त मोहन के साथ अपना टिफ़िन बाँट लेता, जिसने लंच लाना भूल गया था। एक दिन तो उसने पेड़ से गिरे एक छोटे से चिड़िया के घोंसले को भी बड़ी सावधानी से वापस टहनी पर रख दिया।
Short Moral Story in Hindi
हर अच्छे काम के साथ पेड़ पर और सुनहरे फल उगते गए। धीरे-धीरे पूरा पेड़ फिर से चमक उठा। उसकी शाखाएँ सोने जैसी दमकने लगीं, और गाँव के लोग हैरान रह गए।
“अरे, पेड़ तो फिर से जादुई हो गया!” सब लोग बोले।
रवि ने मुस्कराकर कहा, “पेड़ नहीं बदला, हम बदले हैं।”
गाँव वालों को रवि की बात ने गहराई से छू लिया। अब सबने एक-दूसरे की मदद करनी शुरू कर दी। किसान अपने औज़ार साझा करने लगे, महिलाएँ पड़ोसी के घर बीमार व्यक्ति के लिए खाना भेजतीं, बच्चे आपस में खिलौने बाँटने लगे। जल्द ही पूरा गाँव फिर से खुशियों और दयालुता से भर गया।
कुछ ही दिनों में, दयालुता का पेड़ पहले से भी ज़्यादा सुंदर लगने लगा। उसकी सुनहरी शाखाएँ धूप में चमकती थीं — जैसे हर फल कह रहा हो, “दयालुता कभी व्यर्थ नहीं जाती।”
उस दिन से गाँव वालों ने एक वादा किया —
“हम हमेशा दयालु रहेंगे, क्योंकि जब दिल से भलाई निकलती है, तो दुनिया सुनहरी हो जाती है।”
शिक्षा:
दयालुता वह बीज है जिससे खुशी और सुख के फल उगते हैं। जब हम दूसरों की मदद करते हैं, तो असल में हम खुद को बेहतर बनाते हैं।




