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पंचतंत्र की कहानियाँ | Panchatantra Stories | Short Panchatantra Stories

एक छोटे से गांव में जीर्णधन नाम का एक समझदार बनिए का बेटा रहता था। उसका परिवार पहले बहुत संपन्न था, लेकिन वक्त की मार ने उसे निर्धन बना दिया था। अब वह सोचता था, “अगर मैं इसी गांव में रहा, तो कभी उन्नति नहीं कर पाऊंगा। कुछ करना होगा, कहीं और जाकर किस्मत आज़मानी होगी!”

वह परदेश जाकर व्यापार करने का निश्चय कर चुका था। पर समस्या यह थी कि उसके पास धन या सामान कुछ खास नहीं था। बस एक ही चीज़ थी — एक भारी लोहे की तराजू, जो उसके पिता के समय से चली आ रही थी।

जीर्णधन ने सोचा, “यात्रा लंबी है, इसे साथ ले जाना ठीक नहीं। कहीं चोरी हो गई तो?”
इसलिए वह गांव के एक अमीर और प्रतिष्ठित महाजन के पास पहुँचा और बोला,
“भाई साहब, मैं परदेश जा रहा हूँ। मेरे पास यह लोहे की तराजू है, इसे आपके पास धरोहर के रूप में रख रहा हूँ। लौटकर लूँगा।”
महाजन मुस्कराते हुए बोला, “अरे, जीर्णधन! कोई बात नहीं। मेरी तिजोरी में यह सुरक्षित रहेगी। चिंता मत करो।”

कुछ दिन बाद जीर्णधन परदेश चला गया। कई साल बीत गए। मेहनत और ईमानदारी से उसने अच्छा-खासा धन कमा लिया और अब वह गर्व से अपने गांव लौटा।

गांव पहुँचते ही उसने महाजन से मुलाकात की।
“भाई साहब,” जीर्णधन ने विनम्रता से कहा, “मेरी वह तराजू जो मैंने आपके पास छोड़ी थी, अब लौटाने की कृपा करें।”
महाजन ने चेहरे पर बनावटी दुख लाते हुए कहा,
“अरे जीर्णधन, बड़ी अफसोस की बात है। तेरी तराजू तो चूहों ने खा ली।”

Short Panchatantra Stories

जीर्णधन ने अपनी हँसी को मुश्किल से रोका। उसे तुरंत समझ आ गया कि महाजन झूठ बोल रहा है। लेकिन उसने अपने चेहरे पर शांत भाव बनाए रखा।
“ओह, चूहों ने खा ली? चलिए, यह तो उनके कर्म की बात है। इसमें आपकी क्या गलती? आप चिंता न करें।”

महाजन को लगा कि बनिया बड़ा सीधा है। उसने सोचा, “अच्छा है, बिना विवाद के तराजू का झंझट खत्म।”

थोड़ी देर बाद जीर्णधन ने सहजता से कहा,
“भाई साहब, मैं अभी नदी पर स्नान के लिए जा रहा हूँ। अगर आप चाहें तो अपने बेटे धनदेव को भी मेरे साथ भेज दीजिए। उसे भी थोड़ा घूमने-फिरने का आनंद मिलेगा।”

महाजन मुस्कराया, “अरे क्यों नहीं! जाओ बेटा धनदेव, जीर्णधन चाचा के साथ नदी स्नान करने।”
बेटा खुशी-खुशी जीर्णधन के साथ चल पड़ा।

पर जीर्णधन ने मन ही मन सोचा, “अब इस लोभी को उसकी ही चाल में फँसाने का समय आ गया है।”
नदी पहुँचकर उसने चालाकी से धनदेव को पास के एक गुफा में ले जाकर अंदर बंद कर दिया और द्वार पर एक भारी शिला रख दी ताकि वह बाहर न निकल सके।

कुछ देर बाद जीर्णधन अकेला महाजन के घर लौटा।
महाजन ने तुरंत पूछा, “अरे जीर्णधन! मेरा बेटा कहाँ है?”
जीर्णधन ने शांत स्वर में कहा, “उसे चील उठा ले गई।”

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महाजन का चेहरा उतर गया।
“क्या बकवास कर रहे हो! इतनी बड़ी चील किसी इंसान के बच्चे को उठा सकती है?”

जीर्णधन बोला, “अरे भाई साहब, जब आपके घर के चूहे मन भर भारी लोहे की तराजू खा सकते हैं, तो चील बच्चे को क्यों नहीं उठा सकती?”

महाजन का चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
“तू झूठ बोल रहा है! तूने मेरे बेटे को चुरा लिया है!”
जीर्णधन बोला, “तो फिर चलिए, महाराज के पास न्याय के लिए।”

दोनों राजमहल पहुँचे। न्यायाधीश ने दोनों की बातें सुनीं।
महाजन ने कहा, “महाराज, इस बनिये ने मेरे पुत्र को चुरा लिया है।”
न्यायाधीश ने जीर्णधन से पूछा, “क्या यह सत्य है?”
जीर्णधन ने कहा, “नहीं महाराज, उसे तो चील उठा ले गई।”

न्यायाधीश चकित रह गए।
“क्या कभी चील इतने बड़े बच्चे को उठा सकती है?”

जीर्णधन ने शांति से कहा,
“महाराज, अगर इस महाजन के घर के चूहे एक भारी लोहे की तराजू खा सकते हैं, तो चील भी बच्चे को उठा सकती है। बात में विरोध कहाँ है?”

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दरबार में हंसी की लहर दौड़ गई।
न्यायाधीश ने गंभीर होकर पूछा, “क्या सचमुच चूहों ने तराजू खाई थी, महाजन?”
महाजन पसीने से तर-बतर हो गया। उसने झुककर स्वीकार किया,
“महाराज, मैंने झूठ बोला था। तराजू मेरे पास ही है।”

न्यायाधीश बोले, “तो अब वही न्याय होगा जो उचित है। तराजू लौटाओ, और अपना पुत्र वापस लो।”

महाजन ने शर्मिंदा होकर तराजू लौटाई।
जीर्णधन ने भी गुफा में जाकर धनदेव को सुरक्षित वापस ला दिया।

राजा ने कहा,
“जीर्णधन, तुम्हारी बुद्धि और संयम ने आज सच्चाई को उजागर किया है। यह सिखाता है कि झूठ और लालच कभी जीत नहीं सकते।”

और इस प्रकार, चालाकी का जवाब समझदारी से देकर जीर्णधन ने न केवल अपना हक पाया, बल्कि सबका सम्मान भी।

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