राजा की अनोखी परीक्षा | Hindi Stories for Children
बहुत समय पहले की बात है — एक ऐसे राज्य की, जहाँ लोगों पर आलस की मोटी चादर पड़ चुकी थी। वहाँ के लोग इतने ज़्यादा सुस्त हो गए थे कि सुबह सूरज सिर पर चढ़ जाता, लेकिन वे बिस्तर से नहीं उठते।
न खेत में काम, न घर का ध्यान, न सफाई, न पकवान — बस लेटे रहो और हुकुम चलाओ!
किसी को भूख लगती तो दूसरे से कहते — “ज़रा खाना बना दो।”
और दूसरा जवाब देता — “भाई, तू ही बना ले न, मुझे नींद आ रही है।”
धीरे-धीरे हालात इतने बिगड़े कि खाने तक की किल्लत होने लगी। लोग अब इन आलसियों को खिलाने से भी कतराने लगे।
भूखे पेट जब नींद उड़ने लगी, तो सबने मिलकर राजा के पास गुहार लगाई —
“महाराज, हम पर दया कीजिए। हमारे लिए एक जगह बनवाइए जहाँ हम आराम से रह सकें, खा सकें, सो सकें — बिना किसी काम के।”
राजा बुद्धिमान था। उसने थोड़ा सोचा, मुस्कराया और बोला —
“ठीक है, जैसा चाहते हो, वैसा ही होगा।”
राजा ने अपने मंत्री को आदेश दिया — “इन आलसियों के लिए एक विशेष आलसी आश्रम बनवाओ।”
राजा की अनोखी परीक्षा
कुछ ही दिनों में बड़ा सुंदर आश्रम बन गया — नरम बिस्तर, ढेर सारा खाना, और कोई काम नहीं!
आलसी लोग फूले नहीं समा रहे थे — “वाह! अब तो मज़े ही मज़े हैं!”
दिन बीतते गए। वे खाते, सोते, फिर खाते और फिर सोते। काम का तो नाम भी भूल गए।
एक दिन राजा ने सोचा — “देखते हैं, इनकी हालत कैसी है।”
वो अपने मंत्री और सैनिकों के साथ छिपकर उस आश्रम की तरफ गया।
राजा ने सैनिक से कहा — “ज़रा इस आश्रम में आग लगाओ, देखते हैं कौन कितना जागरूक है।”
सैनिक ने वैसा ही किया। कुछ ही देर में आश्रम से धुआँ उठने लगा, आग फैलने लगी।
जैसे ही लपटें भड़कने लगीं, आलसी लोगों की नींद उड़ गई!
कोई चिल्ला रहा था — “बचाओ! बचाओ!”
कोई भाग रहा था — “अरे भागो, आश्रम जल गया!”
सारे लोग जान बचाकर भाग गए…
पर आश्रम के कोने में दो आदमी अब भी लेटे थे।
राजा की अनोखी परीक्षा
थोड़ी देर बाद, उन दोनों में से एक ने करवट बदली और सुस्त स्वर में बोला —
“अरे भाई, लगता है पीठ पर कुछ जलने जैसा हो रहा है।”
दूसरा आँखें बंद किए बोला —
“हूँ… तो क्या हुआ? दूसरी करवट ले लो न।”
और दोनों फिर गहरी नींद में खो गए!
जब राजा ने ये नज़ारा देखा, तो ज़ोर से हँस पड़ा।
फिर मंत्री से बोला —
“मंत्री जी! ये दोनों तो सच्चे आलसी हैं। इनका आलस तो किसी आग से भी नहीं टूटता! बाकी सारे तो बस कामचोर निकले — डरते ही भाग गए। इन्हें सज़ा नहीं, आराम का इनाम मिलना चाहिए।”
राजा ने आदेश दिया कि ये दोनों अब राज्य में सबसे सम्मानित “आलसी महाराज” कहलाएँगे, और बाकियों को काम पर भेज दिया जाए।
शिक्षा:
जीवन में आराम और काम दोनों का संतुलन जरूरी है। अत्यधिक आलस्य से हम अपने कर्तव्यों से भागते हैं, जो कि समाज और खुद के लिए हानिकारक होता है।




