🧠 चाणक्य और तीन पुतलियाँ | Chanakya & Three Dolls 🪆

प्रेरणादायक कहानियाँ | Motivational Stories in Hindi | Best Motivational Story in Hindi

भारत भूमि पर मौर्य साम्राज्य अपने वैभव, समृद्धि और अद्भुत शासन के लिए प्रसिद्ध था। उसके स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान थे — सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य, एक ऐसे राजा जिनकी वीरता और बुद्धिमत्ता का नाम दूर-दूर तक फैला हुआ था।

राजधानी के उस भव्य राजमहल में हर सुबह दरबार सजता था। विशाल हॉल की दीवारों पर सोने की नक्काशी, छतों से झूलते चाँदी के झूमर, और संगमरमर के फर्श पर दीपों की चमक — सब मिलकर ऐसा दृश्य बनाते कि देखने वाला मंत्रमुग्ध हो जाता। राजा के आसन के दाहिनी ओर उनके महामंत्री आचार्य चाणक्य बैठते थे — वही चाणक्य जिन्हें लोग “कौटिल्य” और “विष्णुगुप्त” के नाम से जानते हैं। उनकी तेज़ नज़रों से कोई झूठ नहीं बच पाता था, और उनकी बुद्धि की धार तलवार से भी तीखी मानी जाती थी।

सम्राट चंद्रगुप्त को बचपन से ही अनोखी और विचित्र वस्तुएँ इकट्ठा करने का शौक था। उनके महल में हाथी के छोटे मॉडल, नाचते बंदरों के लकड़ी के खिलौने, जादुई झुनझुने, और मोती से जड़े महलों के लघु रूप तक रखे हुए थे। लेकिन राजा की जिज्ञासा कभी समाप्त नहीं होती थी। वे रोज़ कुछ नया, कुछ अद्भुत देखने की चाह रखते थे।

एक सुबह जब दरबार सज चुका था, चंद्रगुप्त ने हँसते हुए पूछा —
“क्या आज मेरे लिए कोई नया खिलौना आया है? कुछ ऐसा जो पहले कभी न देखा हो?”

तभी एक दरबारी झुककर बोला,
“महाराज, एक दूर देश से आए सौदागर पधारे हैं। वे कहते हैं कि उनके पास ऐसे खिलौने हैं जो रहस्यमयी हैं — जिनमें कुछ अनकहा छिपा है।”

राजा की आँखों में उत्साह की चमक दौड़ गई।
“उन्हें तुरंत दरबार में बुलाया जाए!” उन्होंने आदेश दिया।

कुछ ही क्षणों में दरबार के द्वार खुले। एक वृद्ध सौदागर अंदर आया — लंबी सफ़ेद दाढ़ी, सादे कपड़े, हाथ में एक सुंदर लकड़ी की पेटी। उसकी चाल में शांति थी, लेकिन आँखों में आत्मविश्वास। उसने झुककर प्रणाम किया और धीरे-धीरे पेटी खोली।

अंदर रखे थे — तीन लकड़ी के पुतले, इतने सुंदर कि लगता था किसी कुशल शिल्पी ने उनमें जान डाल दी हो। तीनों एक समान आकार के, एक जैसे वस्त्रों में, और उनके चेहरे भी हूबहू एक जैसे थे।

पूरा दरबार मंत्रमुग्ध होकर उन्हें देखने लगा।

सौदागर बोला,
“महाराज, ये तीन पुतले साधारण नहीं हैं। इनमें से पहला एक लाख मोहरों का है, दूसरा हज़ार मोहरों का और तीसरा मात्र एक मोहर का।”

राजा चंद्रगुप्त हैरान रह गए।
“क्या कहा तुमने? तीनों बिल्कुल एक जैसे दिखते हैं, फिर उनकी कीमत में इतना अंतर क्यों?”

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राजा ने दरबार के मंत्रियों, विद्वानों और पंडितों को देखने लगे।
“कौन बताएगा इन तीन पुतलों का रहस्य? जो समझा देगा, उसे भरपूर इनाम मिलेगा।”

दरबार में गहमागहमी मच गई। हर कोई अपनी-अपनी समझ के अनुसार कुछ कहने लगा। कोई बोला — “इनमें लकड़ी का फर्क होगा।”
दूसरा बोला — “शायद अंदर सोना या चाँदी भरा हो।”
तीसरा बोला — “शायद ये तीनों अलग-अलग शिल्पकारों की कारीगरी हैं।”

पर सच्चाई किसी को नहीं पता थी।

आख़िरकार राजा ने मुस्कराते हुए अपने महामंत्री की ओर देखा।
“गुरुदेव चाणक्य, क्या आप इस रहस्य का समाधान बता सकते हैं?”

चाणक्य ने धीरे से मुस्कराया, और अपनी चमकदार आँखों से पुतलों को ध्यान से देखा।
“राजन,” उन्होंने कहा, “इनका अंतर बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक है। इनका रहस्य इनके भीतर छिपा है।”

पूरा दरबार चुप हो गया। सभी उत्सुक थे — क्या बताने जा रहे हैं चाणक्य?

चाणक्य ने एक सेवक से कहा,
“मुझे तीन तिनके लाओ।”

सेवक तुरंत दौड़ा और तीन सूखे तिनके लेकर आया।
चाणक्य ने पहला तिनका उठाया और पहले पुतले के कान में धीरे से डाला।
सभी की आँखें उस पर टिक गईं।
तिनका पुतले के कान से होता हुआ उसके मुँह तक पहुँचा और वहीं रुक गया।
पुतले के होंठ हल्के-हल्के हिले — जैसे वह सुनकर कुछ सोच रहा हो और केवल ज़रूरत पड़ने पर ही बोलेगा।

अब चाणक्य ने दूसरा तिनका उठाया और दूसरे पुतले के कान में डाला।
यह तिनका एक कान से अंदर गया और सीधे दूसरे कान से बाहर निकल गया।
किसी को कुछ समझ नहीं आया।

फिर चाणक्य ने तीसरा तिनका लिया और तीसरे पुतले के कान में डाला।
यह तिनका सीधे पुतले के मुँह से बाहर निकल आया — मानो वह जो भी सुने, तुरंत बाहर उगल दे।

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राजा चंद्रगुप्त हैरानी से बोले,
“गुरुदेव, कृपया बताइए — इसका क्या अर्थ है?”

चाणक्य ने गंभीर स्वर में कहा —
“राजन, ये तीनों पुतले तीन प्रकार के मनुष्यों के प्रतीक हैं।”

उन्होंने पहले पुतले की ओर इशारा किया —
“यह पहला पुतला उस व्यक्ति का प्रतीक है जो सुनता है, सोचता है, और फिर समझदारी से बोलता है। वह अपने शब्दों का चयन बुद्धिमानी से करता है। ऐसा व्यक्ति समाज के लिए वरदान होता है। इसलिए इसका मूल्य एक लाख मोहरें है।”

फिर उन्होंने दूसरे पुतले की ओर देखा —
“यह दूसरा पुतला उस व्यक्ति का प्रतीक है जो सुनता है पर बोलता नहीं। ऐसे लोग समय देखकर मौन रहना जानते हैं। यह संयम और धैर्य का प्रतीक है। इसलिए इसका मूल्य हज़ार मोहरें है।”

और अंत में तीसरे पुतले की ओर इशारा किया —
“यह तीसरा पुतला उस व्यक्ति का प्रतीक है जो जो भी सुनता है, बिना सोचे-समझे सब कह देता है। ऐसे लोग न केवल दूसरों को नुकसान पहुँचाते हैं, बल्कि स्वयं भी अपमान झेलते हैं। इसलिए इसकी कीमत मात्र एक मोहर है।”

पूरा दरबार स्तब्ध रह गया।
हर कोई समझ गया कि यह केवल पुतलों की नहीं, बल्कि जीवन की गहरी शिक्षा थी।

राजा चंद्रगुप्त कुछ पल मौन रहे। फिर उन्होंने धीरे से कहा —
“गुरुदेव, आपने मुझे आज शब्दों का असली मूल्य सिखाया है। यह सीख मेरे जीवन की सबसे बड़ी दौलत होगी।”

राजा ने सौदागर को भरपूर इनाम दिया और चाणक्य के चरणों में झुककर प्रणाम किया।
उस दिन से चंद्रगुप्त ने अपने जीवन में विवेकपूर्ण मौन और सोच-समझकर बोलने की नीति को अपनाया।

चाणक्य के शब्द उस दिन पूरे दरबार में गूंज उठे —
“जो बोलने से पहले सोचता है, वही सच्चा ज्ञानी है।”

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