लघु कथाएँ | Short Story in Hindi
एक बार की बात है, घने जंगल की पगडंडी पर एक चालाक लोमड़ी टहल रही थी। सूरज की किरणें पेड़ों की पत्तियों के बीच से छनकर ज़मीन पर पड़ रही थीं, और हवा में फलों की मीठी खुशबू घुली हुई थी। लोमड़ी सुबह से भूखी थी — पेट में चूहे कूद रहे थे। तभी उसकी नजर कुछ चमकती चीज़ पर पड़ी।
वह उत्सुक होकर बोली, “हूँ… यह क्या चमक रहा है?”
वह धीरे-धीरे पंजों के बल आगे बढ़ी, और देखा — एक ऊँची बेल पर अंगूरों का बड़ा, सुंदर गुच्छा लटक रहा था। वे अंगूर इतने रसीले और चमकदार थे कि देखने वाले का मन तुरंत ललचा जाए। लोमड़ी के मुँह में पानी आ गया।
“वाह!” वह बोली, “इतने मोटे, मीठे अंगूर तो मैंने कभी नहीं देखे। बस इन्हें खा लूँ, तो सारी थकान मिट जाएगी!”
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उसने चारों ओर देखा — न कोई बाधा, न कोई खतरा। बस बेल बहुत ऊँची थी।
“इतना भी ऊँचा नहीं है,” उसने खुद से कहा, “थोड़ी सी छलांग लगाऊँगी, और अंगूर मेरे!”
वह पीछे हटकर दौड़ी और छलांग लगाई — पर अंगूरों तक पहुँची नहीं।
“हूँ… थोड़ा और ऊँचा उछलना होगा,” उसने बड़बड़ाते हुए कहा।
फिर से कोशिश की — एक, दो, तीन… उछाल! लेकिन इस बार भी सिर्फ हवा ही पकड़ पाई।
अब वह थोड़ी झुंझलाई। माथे से पसीना पोंछते हुए बोली,
“शायद मैं ठीक जगह से नहीं कूदी।”
उसने जगह बदली, फिर छलांग लगाई। पर हर बार नतीजा वही — अंगूर उसकी पहुँच से बस थोड़े से ऊपर रह जाते।
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थककर वह ज़मीन पर बैठ गई, हाँफते हुए बोली,
“हूँ… इतने ऊँचे क्यों लटक रहे हैं ये अंगूर! जैसे मुझे चिढ़ा रहे हों।”
थोड़ी देर सोचकर, उसने सिर उठाकर अंगूरों की ओर देखा और होंठ सिकोड़ते हुए बोली,
“वैसे भी, इतने ऊँचे पर हैं… पके भी नहीं होंगे। जरूर खट्टे होंगे।”
उसने अपने झूठे गर्व को बनाए रखने के लिए खुद को ही समझाया,
“हाँ, हाँ! ये अंगूर तो बिलकुल खट्टे होंगे। मैं तो बस देखने आई थी, खाने की कोई ज़रूरत नहीं!”
इतना कहकर वह अपनी पूँछ हिलाती हुई आगे बढ़ गई — मगर उसके चेहरे से झलक रहा था कि असली वजह थकान और असफलता थी, न कि अंगूरों का स्वाद।
शिक्षा:
जो चीज़ हमें नहीं मिलती, उसे बुरा कहना आसान होता है — पर असली समझदारी यह है कि हम अपनी नाकामी को स्वीकार करें और फिर से कोशिश करें।




