14 वर्ष का लंबा और कष्टदायी वनवास, लंका का भीषण युद्ध, और असुरराज रावण का संहार। इस महागाथा का अंतिम पड़ाव था—प्रभु श्री राम का अपनी जन्मभूमि अयोध्या वापस लौटना। रामायण का यह प्रसंग हमें सिखाता है कि अंधकार चाहे कितना भी घना और लंबा क्यों न हो, अंत में जीत केवल ‘धर्म’ और ‘सत्य’ की ही होती है। जब प्रभु अयोध्या लौटे, तो वह केवल एक नगर का उत्सव नहीं था, बल्कि समस्त चराचर जगत का उल्लास था। श्री राम का राज्याभिषेक ।
श्री राम का राज्याभिषेक
(Ramayana Stories in Hindi)
पुष्पक विमान से अयोध्या आगमन और भरत-मिलाप
विभीषण के अनुरोध पर प्रभु श्री राम, माता सीता, अनुज लक्ष्मण, सुग्रीव और हनुमान जी के साथ पुष्पक विमान पर सवार होकर अयोध्या की ओर चले। वनवास की अवधि समाप्त होने में केवल एक दिन शेष था। उधर अयोध्या में भाई भरत व्याकुल थे कि यदि प्रभु एक क्षण भी देर से आए, तो वे अपने प्राण त्याग देंगे।
जैसे ही पुष्पक विमान अयोध्या की भूमि पर उतरा, चारों ओर ‘जय श्री राम’ के नारों से आकाश गूँज उठा। भरत जी दौड़कर प्रभु के चरणों में गिर पड़े। श्री राम ने उन्हें उठाकर गले से लगा लिया। यह ‘भरत-मिलाप’ इतिहास का सबसे भावुक क्षण था, जहाँ त्याग ने स्वार्थ को पूरी तरह परास्त कर दिया था। तीनों माताओं (कौशल्या, कैकेयी, सुमित्रा) ने अपने बेटों और बहू सीता की आरती उतारी।
राज्याभिषेक की भव्य तैयारी: जब नदियाँ और देवता साक्षी बने
गुरु वसिष्ठ ने राज्याभिषेक का शुभ मुहूर्त निकाला। प्रभु श्री राम के जटा-जूट खोले गए, उन्हें दिव्य स्नान कराया गया और राजसी वस्त्र व आभूषण पहनाए गए। माता सीता का श्रृंगार साक्षात लक्ष्मी जी के समान दमक रहा था।
देवताओं की उपस्थिति: स्वर्ग से ब्रह्मा, शिव और इंद्र आदि देवता इस अलौकिक दृश्य को देखने के लिए विमानों में बैठकर आकाश में एकत्र हुए और पुष्प वर्षा करने लगे।
चारों समुद्रों का जल: हनुमान जी, जामवंत और सुग्रीव सहित सभी वानर वीर चारों दिशाओं के समुद्रों और पवित्र नदियों का पावन जल लेकर आए।
सिंहासन पर विराजे त्रिलोक के स्वामी
एक भव्य रत्नजड़ित सिंहासन पर प्रभु श्री राम और माता सीता विराजमान हुए। गुरु वसिष्ठ ने ब्राह्मणों के साथ मंत्रोच्चार करते हुए प्रभु के मस्तक पर राजतिलक लगाया। जैसे ही मुकुट प्रभु के सिर पर रखा गया, पूरी अयोध्या नगरी शंखनाद, नगाड़ों और मंगल गीतों से सराबोर हो गई।
प्रभु ने इस अवसर पर विभीषण, सुग्रीव, अंगद और सभी वानर सेना को अमूल्य उपहार दिए। जब माता सीता ने हनुमान जी को एक दिव्य मोतियों की माला भेंट की, तो हनुमान जी ने प्रभु के प्रति अपने अनन्य प्रेम को दर्शाते हुए उन मोतियों को चबाकर देखा कि उनमें ‘राम’ हैं या नहीं, और अंततः अपनी छाती चीरकर साक्षात राम-सीता के दर्शन करा दिए।
कहानी का सार
(रामचरितमानस उत्तरकाण्ड- श्री राम का राज्याभिषेक)
श्री राम के राजा बनते ही धरती पर ‘रामराज्य’ की स्थापना हुई। रामचरितमानस के उत्तरकाण्ड में तुलसीदास जी लिखते हैं:
“दैहिक दैविक भौतिक तापा। राम राज नहिं काहुहि ब्यापा॥”
कहानी का सार (The Moral System):
- दुखों का अंत: रामराज्य का अर्थ है ऐसा समाज जहाँ किसी को भी शारीरिक, दैवीय या मानसिक कष्ट न हो। सब लोग अपने धर्म का पालन करें।
- समानता और खुशहाली: रामराज्य में न कोई गरीब था, न कोई दुखी। प्रकृति भी अपनी पूरी कृपा बरसाती थी—वृक्ष हमेशा फलों से लदे रहते थे और नदियाँ स्वच्छ जल से भरी रहती थीं।
- धैर्य का फल मीठा: यह कहानी सिखाती है कि कठिन समय में भी यदि मर्यादा और धर्म का मार्ग न छोड़ा जाए, तो अंत में ईश्वर स्वयं आकर आपको आपका अधिकार सौंपते हैं।
FAQ – अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
(रामायण – अयोध्या में राम का स्वागत)
प्रश्न: श्री राम का राज्याभिषेक किस दिन हुआ था?
उत्तर: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, चैत्र मास की शुक्ल पक्ष की नवमी को प्रभु का जन्म हुआ था और वनवास से लौटने के बाद वैशाख माह के शुरुआत में उनका राज्याभिषेक हुआ था। उनके आने की खुशी में कार्तिक अमावस्या को दिवाली मनाई गई थी।
प्रश्न: रामराज्य की सबसे बड़ी विशेषता क्या थी?
उत्तर: रामराज्य में कोई भी छोटा या बड़ा नहीं था। चोरी, अकाल, और अकाल मृत्यु (कम उम्र में मौत) पूरी तरह समाप्त हो चुकी थी। प्रजा पूरी तरह सुरक्षित और सुखी थी।
प्रश्न: राज्याभिषेक के समय हनुमान जी को क्या उपहार मिला?
उत्तर: माता सीता ने हनुमान जी को मोतियों की एक बहुमूल्य माला दी थी। लेकिन हनुमान जी के लिए प्रभु का प्रेम और उनकी सेवा ही सबसे बड़ा उपहार थी, जिसके बदले राम जी ने उन्हें हमेशा अपने हृदय में स्थान दिया।
प्रश्न: श्री राम के राज्याभिषेक की कथा रामायण के किस काण्ड में है?
उत्तर: यह पावन कथा गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित रामचरितमानस के अंतिम काण्ड, यानी ‘उत्तरकाण्ड’ के शुरुआती भाग में बहुत सुंदरता से वर्णित है।
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