जब भी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वीर क्रांतिकारियों का नाम लिया जाता है, तो “सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है” पंक्तियाँ स्वतः ही जुबान पर आ जाती हैं। यह कालजयी रचना न केवल एक देशभक्ति कविता (Patriotic Poem) है, बल्कि यह उन बलिदानियों का संकल्प था जिन्होंने हँसते-हँसते फाँसी के फंदे को चूम लिया। आज इस लेख में हम सरफ़रोशी की तमन्ना के बोल (Lyrics), उसका गहरा अर्थ और इस कविता से जुड़े अनसुने इतिहास के बारे में विस्तार से जानेंगे।
सरफ़रोशी की तमन्ना के बोल हिंदी में (Full Lyrics)
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तिरे ऊपर निसार
ले तिरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है
वाए क़िस्मत पाँव की ऐ ज़ोफ़ कुछ चलती नहीं
कारवाँ अपना अभी तक पहली ही मंज़िल में है
रहरव-ए-राह-ए-मोहब्बत रह न जाना राह में
लज़्ज़त-ए-सहरा-नवर्दी दूरी-ए-मंज़िल में है
शौक़ से राह-ए-मोहब्बत की मुसीबत झेल ले
इक ख़ुशी का राज़ पिन्हाँ जादा-ए-मंज़िल में है
आज फिर मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार बार
आएँ वो शौक़-ए-शहादत जिन के जिन के दिल में है
मरने वालो आओ अब गर्दन कटाओ शौक़ से
ये ग़नीमत वक़्त है ख़ंजर कफ़-ए-क़ातिल में है
माने-ए-इज़हार तुम को है हया, हम को अदब
कुछ तुम्हारे दिल के अंदर कुछ हमारे दिल में है
मय-कदा सुनसान ख़ुम उल्टे पड़े हैं जाम चूर
सर-निगूँ बैठा है साक़ी जो तिरी महफ़िल में है
वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्यूँ बताएँ क्या हमारे दिल में है
अब न अगले वलवले हैं और न वो अरमाँ की भीड़
सिर्फ़ मिट जाने की इक हसरत दिल-ए-‘बिस्मिल’ में है
कविता का भावार्थ: सरफ़रोशी का अर्थ क्या है?
यदि हम सरफ़रोशी की तमन्ना का अर्थ समझें, तो यह रोंगटे खड़े कर देने वाला है। ‘सरफ़रोशी’ का शाब्दिक अर्थ है “सिर कटाने का जज्बा” या बलिदान देने की तीव्र इच्छा।
इस कविता में कवि अत्याचारी ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दे रहे हैं। ‘बाज़ू-ए-कातिल’ शब्द का प्रयोग दुश्मन की ताक़त को दर्शाने के लिए किया गया है। क्रांतिकारी कहते हैं कि हमें अपनी मौत का डर नहीं है, बल्कि हमें यह देखना है कि कातिल के हाथों में हमें रोकने का कितना दम है। यह राम प्रसाद बिस्मिल की कविता के रूप में इसलिए प्रसिद्ध हुई क्योंकि उन्होंने इसके माध्यम से युवाओं में देशप्रेम की अलख जगाई थी।
बिस्मिल अज़ीमाबादी: सरफ़रोशी की तमन्ना के असली लेखक
अक्सर लोग यह समझते हैं कि यह कविता पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ने लिखी थी। लेकिन सामान्य ज्ञान (GK) और इतिहास के तथ्यों के अनुसार:
- ऐतिहासिक संदर्भ: यह कविता काकोरी कांड (Kakori Conspiracy) के नायकों की पहचान बन गई थी।
- असली रचयिता: इस ग़ज़ल को 1921 में बिस्मिल अज़ीमाबादी (पटना, बिहार) ने लिखा था।
- प्रसिद्धि का कारण: इसे क्रांतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक उल्ला ख़ाँ और ठाकुर रोशन सिंह ने जेल में रहकर और अदालती कार्यवाही के दौरान गा-गाकर पूरे देश में लोकप्रिय बना दिया।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
प्रश्न: सरफ़रोशी की तमन्ना का मुख्य संदेश क्या है?
उत्तर: इसका मुख्य संदेश निडरता और देश के प्रति सर्वस्व न्योछावर करने का संकल्प है। यह आज़ादी की लड़ाई के क्रांतिकारी गीतों में सबसे ऊपर गिनी जाती है।
प्रश्न: “बाज़ू-ए-कातिल” शब्द का इस कविता में क्या प्रतीकात्मक अर्थ है?
उत्तर: यहाँ ‘बाज़ू-ए-कातिल’ का अर्थ है ‘अत्याचारी के हाथ’। यह ब्रिटिश साम्राज्य की दमनकारी शक्ति को दर्शाता है, जिसे क्रांतिकारी चुनौती दे रहे हैं।
प्रश्न: क्या यह भगत सिंह की पसंदीदा कविता थी?
उत्तर: हाँ, क्रांतिकारी भगत सिंह और उनके साथी जेल में अक्सर इन पंक्तियों को गुनगुनाया करते थे।
प्रश्न: क्या यह कविता मूल रूप से एक ग़ज़ल है?
उत्तर: हाँ, तकनीकी रूप से यह एक उर्दू ग़ज़ल है, जिसमें ‘कातिल’, ‘महफ़िल’ और ‘दिल’ जैसे शब्दों का रदीफ़-काफ़िया इस्तेमाल किया गया है।
प्रश्न: राम प्रसाद बिस्मिल ने इस कविता को कब गाया था?
उत्तर: उन्होंने 1927 में गोरखपुर जेल में फांसी के फंदे पर जाते समय और काकोरी कांड की सुनवाई के दौरान अदालत में इस कविता को गाकर प्रसिद्धि दिलाई।
प्रश्न: राम प्रसाद बिस्मिल ने इस कविता को कब गाया था?
उत्तर: उन्होंने 1927 में गोरखपुर जेल में फांसी के फंदे पर जाते समय और काकोरी कांड की सुनवाई के दौरान अदालत में इस कविता को गाकर प्रसिद्धि दिलाई।
“सरफ़रोशी की तमन्ना” केवल एक क्रांतिकारी गीत नहीं, बल्कि भारतीय स्वाभिमान की वह दहाड़ है जिसने ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला दी थी। बिस्मिल अज़ीमाबादी की कलम से निकले ये शब्द और पंडित राम प्रसाद बिस्मिल का अटूट बलिदान आज भी हमें अन्याय के खिलाफ डटकर खड़े होने की प्रेरणा देता है। यह कविता हमें सिखाती है कि जब लक्ष्य राष्ट्र की सेवा हो, तो मृत्यु का भय भी तुच्छ हो जाता है। आज की युवा पीढ़ी के लिए यह रचना साहस और देशभक्ति का एक ऐसा पाठ है, जो कभी पुराना नहीं होगा। यदि हम इस कविता के सार को अपने जीवन में उतार सकें, तो यही उन शहीदों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
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हमारा यह निरंतर प्रयास है कि इन छंदों और कविताओं के माध्यम से हम भावनाओं के उस अदृश्य किंतु सशक्त पुल को जीवंत रख सकें, जो एक रचनाकार को उसके सुधी पाठक से जोड़ता है। साहित्य का वास्तविक सौंदर्य तभी निखरता है जब लेखक की पीड़ा या हर्ष, पाठक की संवेदना बन जाए।
यदि इन पंक्तियों ने आपके मन के किसी भी शांत कोने को छुआ है, आपके अंतर्मन में कोई संवाद छेड़ा है या आपकी दबी हुई भावनाओं को स्वर दिया है, तो हम मानते हैं कि हमारी लेखनी सार्थक हुई। साहित्य का यह सफर शब्दों से शुरू होकर संवेदनाओं तक जाता है और आपकी उपस्थिति ही इस मार्ग का संबल है। नई रचनाओं, अनकहे विचारों और निरंतर काव्य-चर्चा के लिए हमारे साथ इसी प्रकार जुड़े रहें। आपकी प्रतिक्रियाएं ही हमारे सृजन की ऊर्जा हैं।




